Wednesday, May 2, 2018

इतिहास उठाकर देखें संतों की जय-जयकार होती रही है और निंदकों की दुर्गति

🚩जिन भी #संतों-महापुरुषों ने #संस्कृति #रक्षा व #जन-जागृति का कार्य किया है, उनके #खिलाफ #षड्यंत्र रचे गये हैं । जगद्गुरु आद्य #शंकराचार्यजी का इतना #कुप्रचार किया गया कि उनकी माँ के अंतिम संस्कार के लिए उन्हें लकड़ियाँ तक नहीं मिल रही थीं । #महात्मा बुद्ध पर बौद्ध भिक्षुणी के साथ अवैध संबंध एवं उसकी हत्या का #आरोप लगाया गया ।
🚩#स्वामी विवेकानंदजी पर #चारित्रिक #आरोप लगाकर उन्हें खूब बदनाम किया गया । #संत नरसिंह मेहताजी को बदनाम करने व फँसाने के लिए वेश्या को भेजा गया । #संत कबीरजी पर शराबी, कबाबी, वेश्यागामी होने के #घृणित #आरोप लगाये गये । भक्तिमती #मीराबाई पर चारित्रिक #लांछन लगाये गये एवं जान से मारने के कई दुष्प्रयास हुए ।
Seeing the history, the saints have been
cheering and the evil of the slanderers

🚩#संत ज्ञानेश्वरजी और उनके भाइयों व बहन को निंदकों द्वारा #समाज-बहिष्कृत किया गया था । संत #तुकारामजी को #बदनाम करने हेतु उन पर जादू-टोना और पाखंड करने के #झूठे आरोप लगाये गये व वेश्या भेजी गयी । इतना परेशान किया कि उन्हें अपने अभंगों की बही नदी में डालनी पड़ी और उपराम हो के 13 दिनों तक उपवास करना पड़ा ।
🚩वर्तमान में भी #शंकराचार्य श्री जयेन्द्र सरस्वतीजी, #स्वामी नित्यानंदजी, #स्वामी केशवानंदजी, श्री #कृपालुजी महाराज, #संत आशारामजी बापू, #साध्वी प्रज्ञा सिंह आदि हमारे #संतों को #षड्यंत्र में फँसाकर #झूठे आरोप लगा के #गिरफ्तार किया गया, प्रताड़ित किया गया, अधिकांश #मीडिया द्वारा #झूठे आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया परंतु जीत हमेशा सत्य की ही होती रही है और होगी ।
🚩सत्यमेव जयते । ‘सत्य की ही विजय होती है ।’
🚩इतिहास उठाकर देखें तो पता चलेगा कि #सच्चे संतों व महापुरुषों की #जय-जयकार होती रही है और आगे भी होती रहेगी । दूसरी ओर #निंदकों की #दुर्गति होती है और समाज उन्हें घृणा की दृष्टि से ही देखता है । अतएव समझदारी इसीमें है कि हम संतों का आदर करके या उनके आदर्शों को अपनाकर लाभ न ले सकें तो कम-से-कम उनकी निंदा करके या सुनके अपने पुण्य व शांति को तो नष्ट न करें ।
🚩इतिहास देखें तो पता चलेगा कि सच्चे संतों व महापुरुषों के #निन्दकों को कैसे-कैसे #भीषण कष्टों को सहते हुए #बेमौत मरना पड़ा है और पता नहीं किन-किन नरकों में सड़ना पड़ा है। अतैव समझदारी इसी में है कि हम संतों की प्रशंसा करके या उनके आदर्शों को अपना कर लाभ न ले सकें तो उनकी निन्दा करके अपने पुण्य व शांति भी नष्ट नहीं करनी चाहिए।
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