Friday, March 5, 2021

चर्चों में 10000 बच्चों का हुआ शोषण, मीडिया इसपर कुछ नही बोलेगी

 

06 मार्च 2021


कन्नूर (कैरल) के कैथोलिक चर्च की एक नन सिस्टर मैरी चांडी ने पादरियों और ननों का चर्च और उनके शिक्षण संस्थानों में व्याप्त व्यभिचार का जिक्र अपनी आत्मकथा ‘ननमा निरंजवले स्वस्ति’ में किया है कि ‘चर्च के भीतर की जिन्दगी आध्यात्मिकता के बजाय वासना से भरी थी ।




 कैथलिक चर्च की दया, शांति और कल्याण की असलियत दुनिया के सामने उजागर ही हो गयी है । मानवता और कल्याण के नाम पर क्रूरता का पोल खुल चुकी है । चर्च  कुकर्मों की  पाठशाला व सेक्स स्कैंडल का अड्डा बन गया है ।
 फ्रांसीसी चर्चों में शोषण के शिकार हुए बच्चों की संख्या 10 हजार के करीब हो सकती है। यह आशंका चर्चों में बाल शोषण के मामलों की जाँच के लिए गठित स्वतंत्र आयोग के अध्यक्ष जीन मार्क सेवे (Jean-Marc Sauve) ने जताई है। इस जाँच आयोग का गठन कैथोलिक चर्च की ओर से किया गया था। सेवे ने मंगलवार को कहा कि 1950 से अब तक कम से कम 10 हजार बच्चे चर्च में शोषण का शिकार हो सकते हैं।

 रिपोर्टों के अनुसार सेवे ने कहा कि पिछले साल जून में तीन हजार बच्चों के पीड़ित होने का अनुमान लगाया गया था। यकीनी तौर पर असल पीड़ितों के मुकाबले यह संख्या काफी कम है। आयोग के कार्यों के बारे में जानकारी देते हुए एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा, “आशंका है कि यह संख्या कम से कम 10 हजार हो सकती है।”

 जून 2019 में एक हॉटलाइन शुरू की गई थी ताकि पीड़ित और चश्मदीद मामलों की जानकारी दे सकें। बताया जा रहा है कि शुरू होने के बाद 17 महीनों में इस नंबर पर 6,500 कॉल आए। सेवे ने कहा कि आयोग के समक्ष सवाल यह था कि कितनी संख्या में पीड़ित आगे आएँगे और अपने साथ हुए शोषण के बारे में बताएँगे।

उन्होंने कहा, “हमारे सामने बड़ा सवाल यह है कि कितने पीड़ित आगे आएँगे? क्या यह 25 फीसदी होगा? 10 फीसदी? 5 फीसदी या उससे भी कम?”

 2018 में चर्चों में बच्चों के शोषण के लगातार मामले सामने आने के बाद उसी साल नवंबर में इस स्वतंत्र जाँच आयोग का गठन किया गया था। बिशप कॉन्फ्रेंस ऑफ फ्रांस की सहमित से इसका गठन किया गया। इस फैसले को मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली थी। कुछ लोगों ने इसका समर्थन करते हुए पीड़ितों से आगे आकर आपबीती बताने की अपील की थी। वहीं, कुछ लोग इसकी सफलता को लेकर सशंकित थे।20 सदस्यीय आयोग के सदस्य कानूनी, शैक्षणिक, चिकित्सकीय सहित अन्य पृष्ठभूमि से चुने गए थे। आयोग को 2020 के अंत तक अपनी अंतिम रिपोर्ट देनी थी। लेकिन, अब इसकी नई मियाद सितंबर 2021 तय की गई है।

 दुनियाभर में पादरी बच्चों का शोषण करते है लेकिन सेक्युलर, बुद्धजीवी और मीडिया हिन्दू धर्म के पवित्र मंदिर, आश्रमों व साधु-संतों पर षड्यंत्र के तहत कोई आरोप भी लगा दे तो खूब बदनाम करते हैं, परंतु इन ईसाई पादरीयों के दुष्कर्मो पर चुप रहते हैं क्या उन्हें वेटिकन सिटी से भारी फंडिंग मिलती है ?


आइये जानें इस बारे में विदेशी सुप्रसिद्ध हस्तियों के उद्गार-

मैं ईसाई धर्म को एक अभिशाप मानता हूँ, उसमें आंतरिक विकृति की पराकाष्ठा है । वह द्वेषभाव से भरपूर वृत्ति है । इस भयंकर विष का कोई मारण नहीं । ईसाईत गुलाम, क्षुद्र और चांडाल का पंथ है । - फिलॉसफर नित्शे

दुनिया की सबसे बड़ी बुराई है रोमन कैथोलिक चर्च ।  - एच.जी.वेल्स

मैंने पचास और साठ वर्षों के बीच बाईबल का अध्ययन किया तो तब मैंने यह समझा कि यह किसी पागल का प्रलाप मात्र है । - थामस जैफरसन (अमेरिका के तीसरे राष्ट्र पति)

बाईबल पुराने और दकियानूसी अंधविश्वासों का एक बंडल है । बाईबल को धरती में गाड़ देना चाहिए और प्रार्थना पुस्तक को जला देना चाहिए । - जॉर्ज बर्नार्ड शॉ

मैंने 40 वर्षों तक विश्व के सभी बड़े धर्मो का अध्ययन करके पाया कि हिन्दू धर्म के समान पूर्ण, महान और वैज्ञानिक धर्म कोई नहीं है । - डॉ. एनी बेसेन्ट

हिंदुस्तानी ऐसे ईसाई पादरियों और उनका बचाव करने वाली मीडिया और सेक्युलर, बुद्धजीवियों से सावधान रहें  ।

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Thursday, March 4, 2021

लंदन व न्यूजीलैंड के शिक्षकों ने स्वीकारा, संस्कृत पढ़ने से बच्चे बनते हैं महान

04 मार्च 2021


आज अपनी मातृभूमि पर उपेक्षा का दंश झेल रही ‘संस्कृत’ विश्व में एक सम्माननीय भाषा और सीखने के महत्वपूर्ण पड़ाव का दर्जा प्राप्त कर रही है। जहां भारत के सार्वजनिक पाठशालाओं में फ्रेंच, जर्मन और अन्य विदेशी भाषा सीखने पर जोर दिया जा रहा है वहीं विश्व की बहुत सी पाठशालाएं, ‘संस्कृत’ को पाठ्यक्रम का हिस्सा बना रहे हैं !




ऑकलैंड (न्यूजीलैंड) : प्राचीन काल से ही संस्कृत भाषा भारत की सभ्यता और संस्कृति का सबसे मुख्य भाग रही है। फिर भी आज हमारे देश में संस्कृत को पाठशाली शिक्षा में अनिवार्य करने की बात कहने पर इसका विरोध शुरू हो जाता है। हम भारतवासियों ने अपने देश की गौरवमयी संस्कृत भाषा को महत्व नही दिया। आज हमारे देश के विद्यालयों में संस्कृत बहुत कम पढ़ाई और सिखाई जाती है। किंतु आज अपनी मातृभूमि पर उपेक्षा का दंश झेल रही संस्कृत विश्व में एक सम्माननीय भाषा और सीखने के महत्वपूर्ण पड़ाव का दर्जा हासिल कर रही है। जहाँ भारत के तमाम पब्लिक पाठशालों में फ्रेंच, जर्मन और अन्य विदेशी भाषा सीखने पर जोर दिया जा रहा है वहीं विश्व की बहुत सी पाठशालाएं संस्कृत को पाठ्यक्रम का हिस्सा बना रहे हैं।

न्यूजीलैंड की एक पाठशाला में संसार की विशेषतः भारत की इस महान भाषा को सम्मान मिल रहा है। न्यूजीलैंड के इस पाठशाला में बच्चों को अंग्रेजी सिखाने के लिए संस्कृत पढाई जा रही है। फिकिनो नामक इस पाठशाला का कहना है कि, संस्कृत से बच्चों में सीखने की क्षमता बहुत बढ जाती है। न्यूजीलैंड के शहर अॉकलैंड के माउंट इडेन क्षेत्र में स्थित इस पाठशाला में लड़के और लड़कियां दोनों को शिक्षा दी जाती है। 16 वर्ष तक की आयु तक यहाँ बच्चों को शिक्षा दी जाती है ।

इस पाठशाला का कहना है कि, इसकी पढ़ाई मानव मूल्यों, मानवता और आदर्शों पर आधारित है। अमेरिका के हिंदू नेता राजन झेद ने पाठ्यक्रम में संस्कृत को सम्मिलित करने पर फिकिनो की प्रशंसा की है। फिकिनो में अत्याधुनिक साउंड सिस्टम लगाया गया है। जिससे बच्चों को कुछ भी सीखने में आसानी रहती है। पाठशाला के प्रिंसिपल पीटर क्राम्पटन कहते हैं कि, 1997 में स्थापित इस पाठशाला में नए तरह के विषय रखे गए हैं। जैसे दिमाग के लिए भोजन, शरीर के लिए भोजन, अध्यात्म के लिए भोजन।

इस पाठशाला में अंग्रेजी, इतिहास, गणित और प्रकृति के विषयों की भी पढ़ाई कराई जाती है। पीटर क्राम्पटन कहते हैं कि संस्कृत ही एक मात्र ऐसी भाषा है जो व्याकरण और उच्चारण के लिए सबसे श्रेष्ठ है। उनके अनुसार संस्कृत के जरिए बच्चों में अच्छी अंग्रेजी सीखने का आधार मिल जाता है। संस्कृत से बच्चों में अच्छी अंग्रेजी बोलने, समझने की क्षमता विकसित होती है।

पीटर क्राम्पटन कहते हैं कि, दुनिया की कोई भी भाषा सीखने के लिए संस्कृत भाषा आधार का काम करती है। इस पाठशाला के बच्चे भी संस्कृत पढकर बहुत खुश हैं। इस पाठशाला में दो चरणों में शिक्षा दी जाती है। पहले चरण में दस वर्ष की आयु तक के बच्चे और दूसरे चरण 16 वर्ष की आयु वाले बच्चों को शिक्षा दी जाती है। इस पाठशाला में बच्चों को दाखिला दिलाने वाले हर अभिभावक का यह प्रश्न अवश्य होता है कि, आप संस्कृत क्यों पढ़ाते हैं? हम उन्हें बताते हैं कि यह भाषा श्रेष्ठ है। विश्व की महानतम रचनाएं इसी भाषा में लिखी गई हैं।

अमेरिका के हिंदू नेता राजन झेद ने कहा है कि, संस्कृत को सही स्थान दिलाने की आवश्यकता है। एक ओर तो सम्पूर्ण विश्व में संस्कृत भाषा का महत्व बढ रहा है, वहीं दूसरी ओर भारत में संस्कृत भाषा के विस्तार हेतु ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं जिसके कारण भारत में ही संस्कृत का विस्तार नहीं हो पा रहा है और संस्कृत भाषा के महत्व से लोग अज्ञात हैं । हिंदू धर्म के अलावा बौद्ध और जैन धर्म के तमाम ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए हैं।

स्त्रोत : हिन्दू जन जागृति

संस्कृत भाषा की विशेषताएँ-

(1) संस्कृत, विश्व की सबसे पुरानी पुस्तक (वेद) की भाषा है। इसलिये इसे विश्व की प्रथम भाषा मानने में कहीं किसी संशय की संभावना नहीं है।

(2) इसकी सुस्पष्ट व्याकरण और वर्णमाला की वैज्ञानिकता के कारण सर्वश्रेष्ठता भी स्वयं सिद्ध है।

(3) सर्वाधिक महत्वपूर्ण साहित्य की धनी होने से इसकी महत्ता भी निर्विवाद है।

(4) इसे देवभाषा माना जाता है।

(5) संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं बल्कि संस्कारित भाषा भी है अतः इसका नाम संस्कृत है। 
केवल संस्कृत ही एकमात्र ऐसी भाषा है जिसका नामकरण उसके बोलने वालों के नाम पर नहीं किया गया है। संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद् नहीं बल्कि महर्षि पाणिनि, महर्षि कात्यायन और योगशास्त्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं। 
इन तीनों महर्षियों ने बड़ी ही कुशलता से योग की क्रियाओं को भाषा में समाविष्ट किया है। यही इस भाषा का रहस्य है।

(6) शब्द-रूप - विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का एक या कुछ ही रूप होते हैं, जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 27 रूप होते हैं।

(7) द्विवचन - सभी भाषाओं में एकवचन और बहुवचन होते हैं जबकि संस्कृत में
द्विवचन अतिरिक्त होता है।

(8) सन्धि - संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सन्धि। संस्कृत में जब दो अक्षर निकट आते हैं तो वहाँ सन्धि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है।

(9) इसे कम्प्यूटर और कृत्रिम बुद्धि के लिये सबसे उपयुक्त भाषा माना जाता है।

(10) शोध से ऐसा पाया गया है कि संस्कृत पढ़ने से स्मरण शक्ति बढ़ती है।

(11) संस्कृत वाक्यों में शब्दों को किसी भी क्रम में रखा जा सकता है। इससे अर्थ का अनर्थ होने की बहुत कम या कोई भी सम्भावना नहीं होती। 
ऐसा इसलिये होता है क्योंकि सभी शब्द विभक्ति और वचन के अनुसार होते हैं और क्रम बदलने पर भी सही अर्थ सुरक्षित रहता है। जैसे - अहं गृहं गच्छामि या गच्छामि गृहं अहम् दोनो ही ठीक हैं।

(12) संस्कृत विश्व की सर्वाधिक 'पूर्ण' (perfect) एवं तर्कसम्मत भाषा है।

(13) संस्कृत ही एक मात्र साधन है जो क्रमश: अंगुलियों एवं जीभ को लचीला बनाते हैं। इसके अध्ययन करने वाले छात्रों को गणित, विज्ञान एवं अन्य भाषाएँ ग्रहण करने में सहायता मिलती है।

(14) संस्कृत भाषा में साहित्य की रचना कम से कम छह हजार वर्षों से निरन्तर होती आ रही है। इसके कई लाख ग्रन्थों के पठन-पाठन और चिन्तन में भारतवर्ष के हजारों पुश्त तक के करोड़ों सर्वोत्तम मस्तिष्क दिन-रात लगे रहे हैं और आज भी लगे हुए हैं।
 पता नहीं कि संसार के किसी देश में इतने काल तक, इतनी दूरी तक व्याप्त, इतने उत्तम मस्तिष्क में विचरण करने वाली कोई भाषा है या नहीं। शायद नहीं है। दीर्घ कालखण्ड के बाद भी असंख्य प्राकृतिक तथा मानवीय आपदाओं (वैदेशिक आक्रमणों) को झेलते हुए आज भी 3 करोड़ से अधिक संस्कृत पाण्डुलिपियाँ विद्यमान हैं। यह संख्या ग्रीक और लैटिन की पाण्डुलिपियों की सम्मिलित संख्या से भी 100 गुना अधिक है। 
निःसंदेह ही यह सम्पदा छापाखाने के आविष्कार के पहले किसी भी संस्कृति द्वारा सृजित सबसे बड़ी सांस्कृतिक विरासत है।

(15) संस्कृत केवल एकमात्र भाषा नहीं है अपितु संस्कृत एक विचार है। संस्कृत एक संस्कृति है एक संस्कार है संस्कृत में विश्व का कल्याण है, शांति है, सहयोग है, वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना है।


अब केन्द्र सरकार व राज्य सरकारों को सभी स्कूलों, कॉलेजों में संस्कृत भाषा को अनिवार्य करना चाहिए जिससे बच्चों की बुद्धिशक्ति का विकास के साथ साथ बच्चे सुसंस्कारी बने ।

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Wednesday, March 3, 2021

जानिए वैदिक गुरुकुलों की पुनः स्थापना से हमारा और राष्ट्र की कैसे उन्नति होगी?

03 मार्च 2021


English Education Act, 1835 के तहत जब से भारत में ‘मैकाले शिक्षा पद्धति’ शुरु हुई है तब से अब तक की शिक्षा पद्धति को ‘आधुनिक शिक्षा पद्धति’ कहते हैं । इस शिक्षा पद्धति को भारत में शुरु करने का एकमात्र कारण यह था कि दुनिया के अन्य सभी हिस्सों में रहनेवाले लोग अंग्रेज साम्राज्य के गुलाम बन गए थे यानि उन्होंने अंग्रेजों की अधिनता आसानी से स्वीकार कर ली थी, परन्तु एक भारत ही था जहाँ उन्हें बहुत मशक्कत करनी पड़ रही थी क्योंकि यहाँ के गुरुकुलों के आचार्य विद्यार्थियों के स्वास्थ्यबल, प्राणबल, चारित्र्यबल एवं विवेचना-शक्ति को इतना प्रबल बना देते थे कि भारत का विद्यार्थी स्वावलंबी बन जाता था, वह अपने आचार्य के सिवाय किसी की आधिनता स्वीकार नहीं करता था । उसका जीवन उसके आचार्य द्वारा दिये गये उच्च आदर्शों एवं चारित्र्य के संस्कारों से ओतप्रोत होता था । तब मैकाले ने भारत में जगह-जगह घूमकर देखा और पाया कि इनकी तो जीवन शैली बहुत ऊँची है और यहाँ के लोग दृढ़ चरित्रबल वाले हैं । इन्हें आसानी से अपना गुलाम बनाना बहुत मुश्किल है । उसने इन सब बातों पर गहन विचार किया तो निष्कर्ष निकाला कि इनकी जो शिक्षा पद्धति है वो उच्च आदर्शों से सम्पन्न है । इसलिए हमें इनकी शिक्षा पद्धति पर ही कुठाराघात करना चाहिए, ताकि ये भी हमारे गुलाम बन सकें । तब सन् 1835 में मैकाले ने एक रिपोर्ट तैयार करके इंग्लेंड की सरकार को भेजी जिसमें उसने कहा –





"I have travelled across the length and breadth of India and I have not seen one person who is a beggar, who is a thief such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such caliber, that I do not think we would ever conquer this country unless we break the very backbone of this nation which is her spiritual and cultural heritage and therefore I propose that we replace her old and ancient education system, her culture, for if the Indians think that all that is foreign and English is good and greater than their own, they will lose their self-esteem, their native culture and they will become what we want them, a truly dominated nation."

अर्थात्
“मैं पूरा भारत घूमा, वहाँ पर ना ही मुझे कोई भिखारी दिखा और ना ही मुझे कोई चोर मिला, मुझे किसी भी तरह से ना ही कोई धन की कमी दिखाई दी । वहाँ पर लोगों की मोरल वैल्यूज बहुत ऊँची हैं, लोग बहुत इंटेलीजेंट हैं व उनका कैलिबर इतना ज्यादा है कि हम उन्हें नहीं जीत सकते; जब तक कि हम उनकी रीढ़ की हड्डी, उनके एजुकेशन सिस्टम को न तोड़ दें यानि उनकी आध्यात्मिक व सांस्कृतिक विरासत को खत्म न कर दें, भारत को जीतना मुश्किल ही नहीं असंभव है । इसलिए मेरा (लार्ड मैकाले) प्रस्ताव है कि उनके पुराने एजुकेशन सिस्टम व उनकी सांस्कृतिक विरासत को पहले खत्म किया जाए और उन्हें भरोसा दिलाया जाए कि ये सिस्टम सही नहीं है । उन्हें भरोसा दिलाया जाए कि इंग्लिश अच्छी है और उनके पुराने एजुकेशन सिस्टम से बेहतर है ताकि उनका स्वाभिमान (आत्म-सम्मान) खत्म हो जाये और वे अपनी मूल संस्कृति से भटक जाएँ । तभी जो हम चाहते हैं वो हो सकता है, यानि तभी हम उन पर हावी हो सकते हैं; अन्यथा नहीं ।”
तब English Education Act, 1835 के तहत कोंवेंट स्कूलों एवं कॉलेजों को खोला गया और उनका खूब प्रचार-प्रसार किया गया ताकि ‘भारत के लोग शरीर से तो भारतीय रहें परंतु सोच-विचार से अंग्रेजों के गुलाम हो जाएँ यानि अंग्रेजों को ही अपना आदर्श मानकर उनका अनुसरण करें’ । तो यह अंग्रेजों की आधुनिक शिक्षा पद्धति की ही देन है जो आजकल के युवा भारतीय संस्कृति के उच्च आदर्शों को भूलकर अंग्रेजों का ही अनुकरण कर रहे हैं, अपने माता-पिता व गुरुजनों का अनादर कर रहे हैं, लिव इन रिलेशन, गे-सेक्स आदि कुरीतियों को अपना रहे हैं, ज्योइन्ट फैमिली (संयुक्त परिवार) न्यूक्लियर फैमिली (एकाकी परिवार) में परिणत हो रहे हैं, हृदय की जो व्यापकता होनी चाहिए जिस पर एक आदर्श समाज टिका है, उस व्यापकता के स्थान पर लोगों के मन-बुद्धि में संकीर्णता बढ़ रही है, यानि मानव जाति कुल मिलाकर पशुता की ओर अग्रसर हो रही है जिससे जीवन में तनाव, खिंचाव, आपसी वैर-वैमनस्य, कलह, अशांति, बिमारियाँ दिन पर दिन बढ़ रहे हैं ।
आधुनिक शिक्षा पद्धति में अक्षर-ज्ञान तो दिया जाता है परन्तु वो व्यक्ति को एक संपूर्ण मानव बनाने की जिम्मेदारी नहीं लेती । वो उसे एक चलती-फिरती मशीन जरुर बना देगी या फिर अक्षरस्थ एक पशु जरुर तैयार हो जायेगा, परन्तु एक आदर्श मनुष्य की कल्पना आधुनिक शिक्षा पद्धति नहीं कर सकती ।

आधुनिक शिक्षा पद्धति व्यक्ति को परावलंबी बना देती है । ऐसा व्यक्ति अपने जीवन की निजी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी पूरा जीवन मल्टीनेशनल कंपनियों का नौकर बना रहता है और बाद में कंपनीवाले उसे कहीं जॉब से निकाल न दें, कहीं कंपनी बंद न हो जाए आदि-आदि चिंताएँ उसके मन में बनी रहती है यानि कुल मिलाकर वह व्यक्ति एक स्वावलंबी जीवन व्यतीत कभी नहीं कर सकेगा ।

आधुनिक शिक्षा पद्धति व्यक्ति के चरित्र निर्माण पर जोर नहीं देती तो क्या वह एक उच्च आदर्शवादी समाज का निर्माण कर पायेगी ? मित्रों ! भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जिसमें परिवार व्यवस्था देखी जाती है । बाकी विदेशों में परिवार व्यवस्था की कोई अहमियत नहीं है, क्यों ? क्योंकि एक उत्तम परिवार निर्माण के लिए जीवन में संयम, सदाचार, चरित्र बल, नैतिक बल आदि उन्नत आदर्शों की आवश्यकता होती है और कई उन्नत परिवार मिलकर ही एक उन्नत समाज की रचना करते हैं और कई उन्नत समाज मिलकर एक उन्नत राष्ट्र की परिकल्पना कर सकते हैं जो आधुनिक शिक्षा पद्धति से कदापि संभव नहीं है ।
आधुनिक शिक्षा पद्धति में पढ़ा हुआ विद्यार्थी अपने माता-पिता और गुरुजनों का आदर नहीं करता, वह उन्हें तुच्छ और अपने आपको बुद्धिमान समझता है । आधुनिक शिक्षा पद्धति में पढ़ा हुआ विद्यार्थी भारतीय संस्कृति को गौण और पाश्चात्य संस्कृति को महान समझता है । आधुनिक शिक्षा पद्धति विद्यार्थी को अपने मन पर अनुशासन करने की कला नहीं सिखाती; अपितु मन का गुलाम बना देती है । इसलिए मनमाना निर्णय करके अपने को सुखी करने के चक्कर में व्यक्ति उल्टा दुःखी ही होता है । आधुनिक शिक्षा पद्धति में पढ़े हुए विद्यार्थी के जीवन में संयम का कोई स्थान नहीं होता जो उसे चरित्रहीन एवं विलासी बना देता है । इसलिए ऐसे लोग कई ला-इलाज एडस् जैसी बिमारियों एवं अन्य मानसिक रोगों के शिकार हो जाते हैं ।

‘आज का विद्यार्थी पड़ोस की बहन को बहन नहीं कह सकता, विद्यार्थिनी पड़ोस के भाई को अपने भाई के नजरों से नहीं देख सकती’ ऐसा बुरा हाल आधुनिक शिक्षा पद्धति ने बना दिया है तो उत्तम समाज का निर्माण कैसे संभव है ? आधुनिक शिक्षा पद्धति में पढ़े हुए विद्यार्थी के मन में उसे पढ़ानेवाले आचार्यों के प्रति कोई सद्भाव नहीं होता क्योंकि वह शिक्षा उन्होंने अपने ही शिक्षकों की निंदा करते-करते पाई होती है । वे अपने आपको तीसमारखा समझते हैं, अपने सामने किसी को कुछ नहीं गिनते । इसलिए उनका हाल – “Jack of all, Master of None” जैसा हो जाता है ।
संक्षेप में कहा जाए तो आधुनिक शिक्षा पद्धति में पढ़ा हुआ विद्यार्थी एक आदर्श मानव नहीं; अपितु एक जीवित, पढ़ा-लिखा पशु अवश्य बन जाता है । और तो और जो वह अपने पूर्वजों को बंदर समझता है और अपने को सुधरा हुआ मानव मानता है, तो आखिर ऐसी आधुनिक शिक्षा पद्धति से अपेक्षा ही क्या की जा सकती है ?…

जनता की मांग है कि सरकार फिर से वैदिक गुरुकुल खोले और उसमे वैदिक शिक्षा पढ़ाई जानी चाहिए तभी व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की उन्नति हो पायेगी।

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Tuesday, March 2, 2021

अंडे के ऐसे नुकसान जो आपके पहुंचा देंगे बिस्तर पर, भूलकर भी ना करें सेवन

03 मार्च 2021


टीवी चैनलों में विज्ञापन देखकर कुछ लोग अपने शारीरिक विकास के लिए अंडे को सबसे फायदेमंद आहार मानकर सेवन करते हैं। अंडे के तथाकथित फायदों की तो आपने लंबी लिस्ट देखी ही होगी, लेकिन आज हम आपको अंडे के सेहत पर पड़ने वाले ऐसे नुकसानों के बारे में बताने जा हैं जिन्हें जानने के बाद आप अंडो की तरफ देखने से कतराने लगेंगे।




वेटगेन

अंडे में काफी ज्यादा मात्रा में कैलोरी होती है जो कि सेहत को अनचाहे ही काफी नुकसानदेह है। हाल ही में एक रिसर्च में दावा किया गया है कि तीन अंडे खाने से तीन हफ्तों में लगभग 1 पाउंड वजन तक बढ़ सकता है। ओबेसिटी की परेशानी से तो सभी वाकिफ हैं। ऐसे में अगर आप ओवरवेट है तो अंडे के हर फायदे को किनारे कर इससे परहेज ही करें।

हाई कोलेस्ट्रॉल का खतरा

अगर आपको हाई ब्लड प्रेशर या हृदय संबंधी कोई परेशानी है तो आपको अंडे का पीला भाग खाने से परहेज करना चाहिए। क्योंकि इसमें काफी अधिक मात्रा में कोलेस्ट्रॉल होता है। जिससे हाई ब्लड प्रेशर या हृदय संबंधित परेशानी से जूझ रहे लोगों को समस्या हो सकती है।

फूड पॉइजनिंग का बना रहता है खतरा

कच्चे अंडे में से साल्मोनेला का खतरा रहता है। जिससे आपको फूड पॉइजनिंग की समस्या हो सकती है। साथ ही इससे उल्टी, दस्त व पेट दर्द की परेशानी हो सकती है।

मुर्गी के अंडों का उत्पादन बढ़े इसके लिए उसे जो हार्मोन्स दिये जाते हैं उनमें स्टील बेस्टेरोलनामक दवा महत्त्वपूर्ण है । इसदवावाली मुर्गी के अंडे खाने से स्त्रियों को स्तनका कैंसर, हाई ब्लडप्रेशर, पीलिया जैसे रोग होने की सम्भावना रहती है । यह दवापुरुष के पौरुषत्व को एक निश्चित अंश में नष्ट करती है ।

डॉ. पी.सी.सेन, स्वास्थ्य मंत्रालय, भारतसरकार ने भी चेतावनीदी है कि अंडों से कैंसर होता है क्योंकि अंडों में भोजन तंतु नहीं पाये जाते हैं तथा इनमें डी.डी.टी. विष पाया जाता है ।

अंडा शाकाहारी नहीं होता है, लेकिन क्रूर व्यावसायिकता के कारण एवं ऊलजलूल तर्क देकर उसे शाकाहारी सिद्ध किया जा रहा है । मिशिगन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने पक्के तौर पर साबित कर दिया है कि दुनिया में कोई भी अंडा चाहे वह सेया हुआ हो या बिना सेया हुआ हो, निर्जीव नहीं होता । अफलित अंडे की सतह पर प्राप्त ‘इलेक्ट्रिक एक्टिविटी’ कोपोलीग्राफ पर अंकित कर वैज्ञानिकों ने यह साबित कर दिया है कि अफलित अंडा भी सजीव होता है । अंडा शाकाहार नहीं, बल्कि मुर्गी का वैनिक (रज) स्राव है ।

संतुलित शाकाहारी भोजन लेने वाले को अंडा या अन्य मांसाहारी आहार लेने की कोई जरूरत नहीं है ।शाकाहारी भोजनसस्ता, पचने में आसान और आरोग्य की दृष्टि से दोषरहित होता है । कुछ दशक पहले जब भोजन में अंडे का कोई स्थान नहीं था, तब भी हमारे बुजुर्ग तंदुरुस्त रहकर लम्बी उम्र तक जीते थे । अतः अंडे के उत्पादकों और भ्रामक प्रचार की चपेट में न आकर हमें उक्त तथ्यों को ध्यान में रख कर ही अपनी इस शाकाहारी आहार संस्कृति की रक्षा करनी होगी ।

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Monday, March 1, 2021

बिहार में 1057 मस्जिदों में मौलवियों को 15000 सैलरी मिलेंगी

01 मार्च 2021


पूर्व में मुग़लों एवं अंग्रेजों ने भारत के मंदिरों को लूटा, अरबों-खरबों रुपए लेकर चले गए । मंदिर में भक्त इसलिए दान देते हैं कि गरीबों, गायों के रक्षण में, धार्मिक कार्यों में, मंदिर की देखभाल एवं समाज और देश की सेवा के लिए काम आ सके, लेकिन आज उससे विपरीत हो रहा है, बड़े-बड़े मंदिरों को सरकार ने अपने अधीन करके रखा है उसके पैसे मंदिरों, गरीबों एवं देश की सेवा के लिए नहीं बल्कि चर्च, मस्जिद एवं मौलवी और इमाम के लिए खर्च किये जा रहे हैं । एक तरफ तो भारत को धर्मनिरपेक्ष देश कहा जाता है लेकिन वहीं दूसरी तरफ हिंदू मदिरों को लूटकर चर्च और मस्जिदों का विकास किया जा रहा है फिर देश धर्मनिरपेक्ष कहाँ से हुआ?




आपको बता दे कि बिहार स्टेट सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड में पंजीकृत पेशइमाम (नमाज पढ़ाने वाला मौलवी) और मोअज्जिन (अजान देने वालों) के लिए फ़रवरी 2021 का महीना जाते-जाते खुशखबरी दे गया। बिहार स्टेट सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड अब 1057 मस्जिदों के उन सभी मोअज्जिनों और पेशइमामों को मानदेय देने जा रहा है, जो उसके तहत पंजीकृत हैं।
पेशइमाम को 15,000 रुपए प्रतिमाह और मोअज्जिन को 10,000 रुपए प्रतिमाह दिए जाएँगे। बिहार की राजधानी पटना में भी ऐसे 100 मस्जिदें हैं, जो बोर्ड के अंतर्गत रजिस्टर्ड हैं।

मानदेय देने के लिए अल्पसंख्यक कल्याण विभाग की सचिव सफीना एएन, विभाग के निदेशक एएए फैजी, बोर्ड के अध्यक्ष मोहम्मद इरशादुल्लाह और सीईओ खुर्शीद सिद्दीकी ने समीक्षा बैठक भी की, जिसमें ये निर्णय लिया गया। इस सम्बन्ध में शनिवार (मार्च 6, 2021) को बड़ी बैठक होगी, जिसमें इस पर आधिकारिक मुहर लग जाएगी।

‘दैनिक भास्कर’ के पटना संस्करण में प्रकाशित खबर 

मानदेय देने का प्रस्ताव विभाग को उसी बैठक के बाद भेजा जाएगा। उधर बिहार स्टेट शिया वक़्फ़ बोर्ड भी 105 मस्जिदों के पेशइमाम और मोअज्जिनों को मानदेय दे रहा है। उसके अंतर्गत पेशइमाम को 4000 तो मोअज्जिन को 3000 रुपए प्रतिमाह की दर से मानदेय दिया जाता है।
सुन्नी बोर्ड से पूरे बिहार में 1057 मस्जिद रजिस्टर्ड हैं। पटना जंक्शन इमाम मस्जिद, फकीरबाड़ा, करबिगहिया जामा मस्जिद और कुम्हरार मस्जिद इनमें प्रमुख हैं। फ़िलहाल इन मस्जिदों के कर्मचारियों को स्थानीय मस्जिद कमिटी ही मानदेय या वेतन देती है। इसके तहत लोगों से ही 50-100 रुपए चंदा के रूप में लेकर इन्हें दिया जाता है।

उनका कहना है कि उन्हें जो मिलना चाहिए, उतना मानदेय नहीं हो पाता। फिर भी पेशइमाम को 6-8 हजार और मोअज्जिनों को 4-5 हजार रुपए प्रतिमाह मिल जाते हैं। दोनों स्थानीय मुस्लिमों के बच्चों को तालीम भी देते हैं। निकाह, मिलाद व अन्य मजहबी कार्यक्रमों से भी उनकी कमाई होती है।

सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के अध्यक्ष मोहम्मद इरशादुल्लाह ने कहा कि पेशइमाम को 15,000 रुपए प्रतिमाह और मोअज्जिन को 10,000 रुपए प्रतिमाह मानदेय के रूप में दिए जाने से उनका भला हो जाएगा। उन्होंने कहा कि सरकार भी मानदेय देना चाहती है। बोर्ड की बैठक से प्रस्ताव पारित करा कर विभाग को भेजा जाएगा। पश्चिम बंगाल, हरियाणा, केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों में वहाँ के सुन्नी बोर्ड ऐसे मानदेय दे रहे हैं।

हिंदुस्तान में हिंदू मंदिरों व हिंदुओं के टेक्स से हिंदू साधु-संतों को सेलरी नही देकर मौलवियों को सेलरी दी जा रही है ऐसा किसी भी देश मे नही है।

जनता की मांग है कि मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से दूर करे और साधु-संतों को सेलरी मिले।

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