Sunday, March 4, 2018

कान्वेंट स्कूल का सच जानकर आप भी चौंक जायेंगे

March 4, 2018
भारत में आजकल बच्चों को कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाने का प्रचलन बहुत चल रहा है सभी का कहना है कि बच्चों को कॉन्वेंट स्कूल में भेजों, लेकिन वास्तव में उनके माता-पिता कॉन्वेंट स्कूल का सच नही जानते है इसलिए अपने बच्चों को भेजते हैं, आइये आज आपको कॉन्वेंट स्कूलों से अवगत कराते हैं ।
AKnowing the truth of the Convent School will surprise you

क्या आप भी अपने बच्चों को गटर (convent) में भेजते हैं ?
करीब 2500 साल पहले यूरोप में बच्चे पालने की परंपरा नहीं थी। बच्चा पैदा होते ही उसे टोकरी में रखकर लावारिस छोड़ दिया जाता था। अगर किसी चर्च के व्यक्ति की नजर पड़े तो वो बच जाता था नहीं तो उसे जानवर खा जाते थे।
कान्वेंट का सच...
जिस यूरोप को हम आधुनिक व खुले विचारों वाला मानते हैं, आज से 500 वर्ष पहले वहाँ सामान्य व्यक्ति मैरेज (शादी) भी नहीं कर सकता था क्योंकि उनके बहुत बड़े (दार्शनिक) अरस्तू का मानना था कि आम जनता मैरेज करेगी तो उनका परिवार होगा, समाज होगा तो समाज शक्तिशाली बनेगा, शक्तिशाली हो गया तो राजपरिवार के लिए खतरा बन जाएगा।  इसलिए आम जनता को मैरेज न करने दिया जाए। बिना मैरेज के जो बच्चे पैदा होते थे, उन्हें पता न चले कि कौन उनके माँ-बाप हैं, इसलिए उन्हें एक साम्प्रदायिक संस्था में रखा जाता था, जिसे वे कान्वेंट कहते थे। उस सहजता के प्रमुख को ही माँ- बाप समझे इसलिए उन्हें फादर, मदर, सिस्टर कहा जाने लगा।
यूरोप के दार्शनिक रूसो के अनुसार बच्चे पति पत्नी के शारीरिक आनंद में बाधक हैं इसलिए इनको रखना अच्छा नहीं है क्योंकि शारीरिक आनंद ही सब कुछ होता है और एक दार्शनिक प्लेटो के अनुसार हर मनुष्य के जीवन का आखिरी उद्देश्य हैं शारीरिक आनंद  की प्राप्ति और बच्चे अगर उसमें रुकावट है तो उन्हें रखना नहीं छोड़ देना है।
ऐसे ही दूसरे दार्शनिक जैसे दिकारते, लेबेनीतज, अरस्तू सबने अपने बच्चों को लावारिस छोड़ा था।
ऐसे छोड़े हुए बच्चों को रखने के लिए यूरोप के राजाओं ने या सरकारों ने कुछ संस्थाएँ खड़ी की जिनको CONVENT कहा जाता था। CONVENT माने लावारिस बच्चो का स्कूल । CONVENT में पढ़ने वाले बच्चों को माँ बाप का एहसास कराने के लिए यहाँ पर पढ़ाने वाले जो अध्यापक होते है उनको मदर, फादर, ब्रदर, सिस्टर कहते हैं।
आप सोच रहें होंगे उस समय अमेरिका यूरोप की क्या स्थिति थी, तो सामान्य बच्चो के लिए सार्वजनिक विद्यालयों की शुरुआत सबसे पहले इंग्लैंड में सन 1868 में हुई थी, उसके बाद बाकी यूरोप अमेरिका अर्थात जब भारत में प्रत्येक गांव में एक गुरुकुल था,  97% साक्षारता थी तब इंग्लैंड के बच्चों को पढ़ने का अवसर मिला। तो क्या पहले वहाँ विद्यालय नहीं होते थे ? होते थे परंतु महलों के भीतर, वहाँ ऐसी मान्यता थी कि शिक्षा केवल राजकीय व्यक्तियों को ही देनी चाहिए सबको तो सेवा करनी चाहिए ।
अब आप ही तय करें आपको क्या चाहिए कान्वेंट ? या गुरुकुल ? स्त्रोत : संस्कारवान पत्रिका
भारत में कॉन्वेंट स्कूलों में कोई हिन्दू त्यौहार नही मनाने देते हैं और न ही उन दिनों में छुट्टियां दी जाती हैं, तिलक या मेहंदी लगाकर जाये तो भी उनको सजा दी जाती है, मतलब हिन्दू संस्कृति मिटाने का खुला षडयंत्र रचा जा रहा है, कॉन्वेंट स्कूल में बच्चों के यौन शोषण के मामले भी कई सामने आए हैं।
भारत मे कॉन्वेंट स्कूलों की स्थापना...
भारत से लॉर्ड मैकाले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी : “ मैंने जो कॉन्वेंट स्कूलों की स्थापना की है, इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में, संस्कृति के बारे में, परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, जब ऐसे बच्चे होंगे भारत में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी।”
उसने कहा था कि ‘मैं यहाँ (भारत) की शिक्षा-पद्धति में ऐसे कुछ संस्कार डाल जाता हूँ कि आनेवाले वर्षों में भारतवासी अपनी ही संस्कृति से घृणा करेंगे... मंदिर में जाना पसंद नहीं करेंगे... माता-पिता को प्रणाम करने में तौहीन महसूस करेंगे, साधु-संतों से नफरत करेंगे... वे शरीर से तो भारतीय होंगे लेकिन दिलोदिमाग से हमारे ही गुलाम होंगे..!'
उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ-साफ दिखाई दे रही है, आज कॉन्वेंट स्कूल की शिक्षा पद्धति के कारण JNU जैसी यूनवर्सिटी में छात्र हिन्दू देवी-देवताओं को ही गालियां बोल रहे हैं, दारू पी रहे हैं, मांस खा रहे हैं, दुष्कर्म कर रहे हैं, बॉलीवुड, मीडिया ,टीवी सीरियलों में लोग हिन्दू तो दिखते हैं लेकिन दिलोदिमाग से अंग्रेज होते जा रहे हैं । इसलिए हिन्दू देवी-देवताओं, साधु-संतों, हिन्दू त्यौहारों के खिलाफ हो गए हैं।
भारत ने वेद-पुराण, उपनिषदों से पूरे विश्व को सही जीवन जीने की ढंग सिखाया है । इससे भारतीय बच्चे ही क्यों वंचित रहे ?
जब मदरसों में कुरान पढ़ाई जाती है, मिशनरी के स्कूलों में बाइबल तो हमारे स्कूल-कॉलेजों में रामायण, महाभारत व गीता क्यों नहीं पढ़ाई जाएँ ?
जबकि मदरसों व मिशनरियों में शिक्षा के माध्यम से धार्मिक उन्माद बढ़ाया जाता है और हिन्दू धर्म की शिक्षा देश, दुनिया के हित में है ।
सभी हिन्दू अभिभावकों को भी कॉन्वेंट स्कूल में हिन्दू छात्रों पर पड़ने वाले गलत संस्कारों तथा उनके साथ हो रही प्रताड़ना को देखते हुए अपने बच्चों को वहां नहीं भेजना चाहिए । कॉन्वेंट स्कूल का संपूर्ण बहिष्कार करना चाहिए ।
कई घटना में छात्रा ने कॉन्वेंट स्कूल प्रशासन के ‘टाॅर्चर’ के कारण आत्महत्या कर ली और एक विद्यार्थी कूद गया । कर्इ घटनाआें में यह सामने आया है कि किसी भी अपयश, ब्लू वेल जैसे गेम्स या किसी प्रकार की ‘टॉर्चर’ की कारण बच्चे आत्महत्या कर लेते हैं । 
इसका मूल कारण है उनमें सुसंस्कारों का अभाव । यदि आप अपने बच्चों को अच्छे संस्कारी बनाना चाहते हैं तो कॉन्वेंट स्कूल में बच्चों को पढ़ाना बन्द करें और गुरुकुलों में पढ़ाना शुरू करदें।

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