Friday, February 2, 2018

अंग्रेजों के विरुद्ध सबसे पहले युद्ध का आरंभ करनेवाले वाली पराक्रमी हिन्दू रानी चेन्नम्मा

February 2, 2018

देश में वामपंथियों ने जो इतिहास लिखा है उसमें से अधिकतर असली इतिहास गायब कर दिया है और क्रूर आक्रमणकारी, लुटेरे, बलात्कारी मुगलों का और देश की संपत्ति लूट ले जाने वाले अंग्रेजो का महिमामण्डन किया है लेकिन देश की आज़ादी में उनके खिलाफ लड़कर अपने प्राणों का बलिदान देने वालों का इतिहास लिखा ही नही गया ।

रानी चेन्नम्मा भारत की स्वतंत्रता हेतु सक्रिय होनेवाली पहली महिला थी । सर्वथा अकेली होते हुए भी उसने ब्रिटिश साम्राज्य पर कड़ा धाक जमाए रखा । अंग्रेंजों को भगाने में रानी चेन्नम्मा को सफलता तो नहीं मिली, किंतु ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध खडा होने हेतु रानी चेन्नम्मा ने अनेक स्त्रियों को प्रेरित किया । कर्नाटक के कित्तूर संस्थान की वह चेन्नम्मा रानी थी । आज वह कित्तूर की रानी चेन्नम्मा के नाम से जानी जाती है । आइए, इतिहास में थोड़ा झांककर उनके विषय में अधिक जान लेते हैं ।

रानी चेन्नम्मा का बचपन
The mighty Hindu Rani Chennamma, who started the first war against the British,

रानी चेन्नम्मा का जन्म ककती गांव में (कर्नाटक के उत्तर बेलगांव के एक देहात में ) 1778  में , झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से लगभग 56 वर्ष पूर्व हुआ । बचपन से ही उसे घोडेपर बैठना, तलवार चलाना तथा तीर चलाना इत्यादि का प्रशिक्षण प्राप्त हुआ । पूरे गांव में अपने वीरतापूर्ण कृत्यों के कारण से वह परिचित थी ।

रानी चेन्नम्मा का विवाह कित्तूर के शासक मल्लसारजा देसाई से 15 वर्ष की आयु में हुआ । उनका विवाहोत्तर जीवन 1816 में उनके पति की मृत्यु के पश्चात एक दुखभरी कहानी बनकर रह गया । उनका एक पुत्र  था, किंतु दुर्भाग्य उनका पीछा कर रहा था । 1824 में उनके पुत्र ने अंतिम सांस ली, तथा उस अकेली को ब्रिटिश सत्ता से लडने हेतु छोडकर चला गया ।

रानी चेन्नम्मा एवं ब्रिटिश सत्ता

ब्रिटिशों ने स्थानिक संस्थानों पर ‘व्यय समाप्ति का नियम’ (डॉक्ट्रीन ऑफ लॅप्स) लगाया । इस घोषणानुसार, स्थानिक शासनकर्ताओं को यदि अपनी संतान न हो तो, बच्चा गोद लेने की अनुमति नहीं थी । इससे उनका संस्थान ब्रिटिश साम्राज्य में अपने आप समाविष्ट हो जाता था ।

अब कित्तूर संस्थान धारवाड जिलाधिकारी श्री. ठाकरे के प्रशासन में आ गया । श्री. चॅपलीन उस क्षेत्र के कमिश्नर थे । दोनों ने नए शासनकर्ता को नहीं माना, तथा सूचित किया कि कित्तूर को ब्रिटिशों का शासन स्वीकार करना होगा ।

ब्रिटिशों के विरुद्ध युद्ध

ब्रिटिशों के मनमाने व्यवहार का रानी चेन्नम्मा तथा स्थानीय लोगों ने कड़ा विरोध किया । ठाकरे ने कित्तूर पर आक्रमण किया । इस युद्ध में सैंकडों ब्रिटिश सैनिकों के साथ ठाकरे मारा गया । एक छोटे शासक के हाथों अवमानजनक हार स्वीकार करना ब्रिटिशों के लिए बडा कठिन था । म्हैसूर तथा सोलापुर से प्रचंड सेना लाकर उन्होंने कित्तूर को घेर लिया ।

रानी चेन्नम्मा ने युद्ध टालने का अंत तक प्रयास  किया, उसने चॅपलीन तथा बॉम्बे प्रेसिडेन्सी के गवर्नर से बातचीत की, जिनके प्रशासन में कित्तूर था । उसका कुछ परिणाम नहीं निकला । युद्ध घोषित करना चेन्नम्मा को अनिवार्य  किया गया । 12 दिनों तक पराक्रमी रानी तथा उनके सैनिकों ने उनके किले की रक्षा की, किंतु अपनी आदत के अनुसार इस बार भी देशद्रोहियों ने तोपों के बारुद में कीचड एवं गोबर भर दिया । 1824 में रानी की हार हुई ।

उन्हे बंदी बनाकर जीवनभर के लिए बैलहोंगल के किले में रखा गया । रानी चेन्नम्मा ने अपने बचे हुए दिन पवित्र ग्रंथ पढने में तथा पूजा-पाठ करने में बिताए । 1829 में उनकी मृत्यु हुई ।

कित्तूर की रानी चेन्नम्मा ब्रिटिशों के विरुद्ध युद्ध भले ही न जीत सकी, किंतु विश्व के इतिहास में कई शताब्दियों तक उसका नाम अजरामर हो गया । ओंके ओबवा, अब्बक्का रानी तथा केलदी चेन्नम्मा के साथ कर्नाटक में उसका नाम शौर्य की देवी के रुप में बडे आदरपूर्वक लिया जाता है ।

रानी चेन्नम्मा एक दिव्य चरित्र बन गई है । स्वतंत्रता आंदोलन में, जिस धैर्यसे उसने ब्रिटिशों का विरोध किया, वह कई नाटक, लंबी कहानियां तथा गानों के लिए एक विषय बन गया । लोकगीत एवं लावनी गानवाले कवी, शाहीर जो पूरे क्षेत्र में घूमते थे, स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में जोश भर देते थे ।

एक आनंद की बात है कि, कित्तूर की चेन्नम्मा का पुतला नई देहली के संसद भवन के परिसर में 11 सितंबर 2007 को स्थापित किया गया । एक पराक्रमी रानी को यही खरी श्रद्धांजलि है । भारत में ब्रिटिशों के विरुद्ध सबसे पहले युद्धका आरंभ करनेवाले शासकों में से वह एक थी । स्तोत्र : हिन्दू जन जागृति

आपने पराक्रमी हिन्दू रानी चेन्नम्मा के बारे में पढ़ा, पति और पुत्र का स्वर्गवास हो गया, सामने अंग्रेजो की बड़ी सेना थी उसके बाद भी वो अंग्रेजो से लडी भले किसी ने गद्दारी की और वो हार गई लेकिन वे मन से कभी नही हारी आखिरी समय जेल में बिताना पड़ा फिर भी दुःखी नही हुई और सनातन हिन्दू धर्मग्रंथों का पठन करती रही । यही भारतीय संस्कृति है कि सामने कितनी भी विकट परिस्थिति आ जाये लेकिन हारना नही है धैर्य पूर्वक सामना करते रहना चाहिए ।

रानी चेन्नम्मा से हर भारतवासी को प्रेरणा लेनी चाहिए "अत्याचार करना तो पाप है लेकिन अत्याचार सहन करना दुगना पाप है" इस सूत्र को ध्यान में लेकर जहां भी देश, संस्कृति के खिलाफ कोई कार्य हो रहा है उसका विरोध करना चाहिए ।
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