Saturday, June 22, 2019

भारत ने जिसे ठुकराया उसे विदेशों में अपनाकर अरबों रुपए कमा रहे हैं


20 जून 2019
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🚩 हमारा यह भारत देश, यहाँ की संस्कृति, यहाँ का प्राचीन रहन-सहन वास्तव में कितना अद्भुत और वैज्ञानिक तथा फायदेमंद है इसका अंदाजा हम स्वयं भी नहीं लगा सकते, तभी तो पाश्चात्य अर्थात पिछड़ी हुई संस्कृति का अंधानुकरण कर खुद को बुद्धिमान गिनाते हैं ।

🚩 अंग्रेजी में एक कहावत है "Old Is Gold" अर्थात पुराना सबसे बेहतर या यूँ कहें पुरानी चीजें, पुराने तौर-तरीके, रहन-सहन सबसे बेहतर होता है । और ये महज कहने की बात नहीं है, ये आज के भौतिक युग की यही विशेषता है कि वह धीरे-धीरे अपने पुराने तौर-तरीकों की ओर ही बढ़ रहा है, विदेशों में बड़े ही जोर-शोर से भारत की प्राचीनतम पद्धतियों को अपनाया जा रहा है ।
🚩आज जब पर्यावरण प्रदूषण एक अहम मुद्दा बनकर हम सबके सामने आता है तो ऐसे में पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाना, उसकी रक्षा करना भी हम सबका कर्तव्य बन जाता है, लेकिन आधुनिक युग में व्यक्ति का जीवन, रहन-सहन कुछ इस तरह हो गया है कि वह पर्यावरण प्रदूषण का एक मुख्य कारक बनकर सामने आ जाता है । अब बात आवागमन की हो, मनोरंजन की अथवा भोजन की हर तरीके से मानव किसी न किसी रूप में पर्यावरण को क्षति पहुँचाता ही है ।
🚩पुराने समय में भोजन के लिए पत्तों से बनी प्लेट का प्रयोग किया जाता था, जिसे प्रयोग में लाने के बाद फेंकने पर वह सड़ जाती थी तथा उससे एक प्रकार की खाद का निर्माण भी हो जाता था जो भूमि के लिए भी उपयोगी था, लेकिन भोजन के लिए आज कल लोग थर्माकोल अथवा प्लास्टिक की प्लेटों का प्रयोग करते हैं जोकि आसानी से नष्ट नहीं होता है, उसे नष्ट होने में हजारों वर्ष का समय लग जाता है, साथ ही भोजन करने वाले के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है । पत्ते से बने प्लेट्स को नष्ट होने जहाँ महज 28 दिनों का समय लगता है, वहीं थर्माकोल की प्लेट्स को नष्ट में होने में अधिक समय लगने के कारण यह भूमि की उर्वरा शक्ति को भी नुकसान पहुँचाती है और यदि इसे जलाकर नष्ट किया गया तो कई विषैले गैस निकलते हैं तथा वायु में मिलकर उसे जहरीला बनाते हैं ।
🚩अब सवाल यह आता है कि क्या इससे बचने का कोई ठोस उपाय है ? जवाब है "हाँ" । इससे बचने का एक ही उपाय है वही पुरानी पत्तों से बनी प्लेट । अब इन पत्तों से बनी प्लेट्स का प्रयोग भारी मात्रा में विदेशों में किया जा रहा है । जी हां वही प्लेट्स जिसे भारत ने तो ठुकरा दिया, लेकिन जर्मनी ने अपनाया ।
🚩जर्मनी में पत्तों से बनी प्लेट्स का निर्माण जोर-शोर से किया जा रहा है । वहाँ प्लेट्स बनाने वाली कई कम्पनियां भी स्थापित हो चुकी हैं और अब उन पत्तलों को अर्थात पत्तों की प्लेट्स को इम्पोर्ट भी किया जाएगा । जर्मनी में इन पत्तलों की कीमत 8 यूरो अर्थात 600 रुपए है । मतलब प्रकृति का प्रयोग कर पैसे कमाने का एक बेहतरीन तरीका ।
🚩लेकिन ये बात भारतवासी तब तक नहीं समझेंगे जबतक कि उसपर विदेशी ठप्पा न लग जाए । कितनी अजीब बात है न कि भारत की पद्धति है, भारत के लोग अपनाते नहीं, विदेशों में इन चीजों पर अमल किया जाता है उसपर विदेशी ठप्पा लगता है, तब मूर्ख भारतीय उसे खरीद कर अपने आप को आधुनिक मानते हैं ।
🚩एक और महत्वपूर्ण तथ्य आपके सामने रखते हैं । दक्षिण भारत में केले के पत्ते और भोजन खाने का रिवाज है, केले के पत्ते में भोजन करना अत्यंत फायदेमंद है । जब केले के पत्ते पर गर्म-गर्म भोजन डाला जाता है तो कई पोषक तत्व भी उस भोजन में मिल जाते हैं, यह केमिकल रहित होता है, ग्रीन टी में जो गुण पाए जाते हैं वो इस पत्ते में भी पाए जाते हैं ।
🚩 हमारे चीजों का, पद्धतियों उपयोग चाहे वो योग हो या गाय से मिलने वाला अमृत और अब चाहे यह पत्ते से बनी प्लेट्स इन सबको हम भूलते जा रहे हैं और विदेशी अपनाते जा रहे हैं । अपनी रीति-रिवाज तथा प्राचीन रहन-सहन का महत्व समझें वरना आजीवन नकल ही करते रह जाएंगे और विदेशी लोग फायदा उठाकर अरबो-खरबों रुपए ले जायेंगे।
🚩अपनी संस्कृति सबसे प्राचीन और महान है उसको विदेशी लोग अपनाकर फायदा उठा रहे हैं और हम उनकी पाश्चात्य संस्कृति अपनाकर पतन के रास्ते जा रहे हैं, अतः सावधान रहें हमारी संस्कृति का आदर करें, अपनाएं और जीवन को महान बनाएं ।
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