Tuesday, February 28, 2017

अंग्रेज भारत आकर आयुर्वेद का इलाज कराते हैं और हम : अक्षय कुमार

अंग्रेज भारत आकर आयुर्वेद का इलाज कराते हैं और हम... : - अक्षय कुमार

सेना और मार्शल आर्ट जैसे गंभीर मुद्दों पर बोलने वाले अक्षय कुमार ने एक वीडियो द्वारा आयुर्वेदिक इलाज के फायदे बताये हैं । दरअसल अक्षय कुमार ने 14 दिन केरल के एक आयुर्वेदिक आश्रम में बिताए । 

ये इस दौरान मिले अनुभव का हिस्सा हैं । आइये 10 पॉइंट्स द्वारा जाने कि अक्षय कुमार ने क्या कहा !!
          अंग्रेज भारत आकर आयुर्वेद का इलाज कराते हैं और हम.- अक्षय कुमार


1). आप लोगों से सीधे बात करके मजा आ रहा है । आज मैं आपको दुःख या गुस्सा नहीं, बल्कि मुस्कान शेयर करना चाहता हूँ, पिछले कुछ दिन मैंने केरल में एक शांत आश्रम में बिताए ।

2). इस बार मेरा जो अनुभव रहा वो कमाल का था । मैंने आयुर्वेदिक के बारे में जाना ।

3). इस आश्रम में मेरे पास न टीवी था, न फोन, न ब्रांडेड कपड़े सिर्फ सादा कुर्ता- पायजामा व सादा खाना था ।

4). बहुत कम लोगों को पता है कि मैं पिछले 25 सालों से आयुर्वेदिक को अपना रहा हूँ । आयुर्वेदिक में हर बीमारी का इलाज संभव है । लेकिन लोग इसे भूलते जा रहें हैं।

5). जैसे आप कभी कभी अपनी बाइक और कार की सर्विसिंग करते हैं । ठीक उसी तरह मैंने भी अपनी बॉडी की सर्विसिंग कराई ।  वह आनंददायी रही ।

6). लोगो को अंदाजा ही नहीं कि आयुर्वेद के रूप में भगवान ने हमारे देश को कितना बड़ा खजाना दिया है । अंग्रेज हमारे यहां विदेश से आयुर्वेदिक इलाज कराने आते हैं और हम इससे दूर भागते हैं । दिलचस्प बात यह है कि केरल के उस आश्रम में मैं एकमात्र भारतीय था बाकि सभी विदेशी लोग थे ।

7). हमारी सरकार में एक आयुष मंत्रालय भी है । मैंने कहीं पढ़ा था यदि आप रजिस्टर्ड आयुर्वेदिक सेंटर पर इलाज करते हैं तो आपको इंश्योरेंस आदि की सुविधा भी मिलेगी ।

8) . मुझे एलोपैथी से कोई तकलीफ नहीं है  , लेकिन हम अपनी भारतीय चिकित्सा पद्धति को भूल रहें हैं । यह उचित नही है । इससे तकलीफ होती है । हमारे साथ दीया तले अँधेरा जैसी स्थिति है ।

9). मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मैं किसी आयुर्वेदिक कंपनी के ब्रैंड के प्रचारक के तौर पर यह सब नही कह रहा हूँ । मैंने यह सब खुद महसूस किया है ।

10). केरल से आने के बाद मैं हल्का और शांत महसूस कर रहा हैं । ऐसा अनुभव पहले कभी नहीं मिला ।


आयुर्वेद निर्दोष एवं उत्कृष्ट चिकित्सा-पद्धति

आयुर्वेद एक निर्दोष चिकित्सा पद्धति है। इस चिकित्सा पद्धति से रोगों का पूर्ण उन्मूलन होता है और इसकी कोई भी औषध दुष्प्रभाव (साईड इफेक्ट) उत्पन्न नहीं करती। आयुर्वेद में अंतरात्मा में बैठकर समाधिदशा में खोजी हुई स्वास्थ्य की कुंजियाँ हैं। एलोपैथी में रोग की खोज के विकसित साधन तो उपलब्ध हैं लेकिन दवाइयों की प्रतिक्रिया (रिएक्शन) तथा दुष्प्रभाव (साईड इफेक्टस) बहुत हैं। अर्थात् दवाइयाँ निर्दोष नहीं हैं क्योंकि वे दवाइयाँ बाह्य प्रयोगों एवं बहिरंग साधनों द्वारा खोजी गई हैं। आयुर्वेद में अर्थाभाव, रूचि का अभाव तथा वर्षों की गुलामी के कारण भारतीय खोजों और शास्त्रों के प्रति उपेक्षा और हीन दृष्टि के कारण चरक जैसे ऋषियों और भगवान अग्निवेष जैसे महापुरुषों की खोजों का फायदा उठाने वाले उन्नत मस्तिष्कवाले वैद्य भी उतने नहीं रहे और तत्परता से फायदा उठाने वाले लोग भी कम होते गये। इसका परिणाम अभी दिखायी दे रहा है।

हम अपने दिव्य और सम्पूर्ण निर्दोष औषधीय उपचारों की उपेक्षा करके अपने साथ अन्याय कर रहे हैं। सभी भारतवासियों को चाहिए कि आयुर्वेद को विशेष महत्त्व दें और उसके अध्ययन में सुयोग्य रूचि लें। आप विश्वभर के डॉक्टरों का सर्वे करके देखें तो एलोपैथी का शायद ही कोई ऐसा डॉक्टर मिले जो 80 साल की उम्र में पूर्ण स्वस्थ, प्रसन्न, निर्लोभी हो। लेकिन आयुर्वेद के कई वैद्य 80 साल की उम्र में भी निःशुल्क उपचार करके दरिद्रनारायणों की सेवा करने वाले, भारतीय संस्कृति की सेवा करने वाले स्वस्थ सपूत हैं।

(एक जानकारी के अनुसार 2000 से भी अधिक दवाइयाँ, ज्यादा हानिकारक होने के कारण अमेरिका और जापान में जिनकी बिक्री पर रोक लगायी जाती है, अब भारत में बिक रही हैं। तटस्थ नेता स्वर्गीय मोरारजी देसाई उन दवाइयों की बिक्री पर बंदिश लगाना चाहते थे और बिक्री योग्य दवाइयों पर उनके दुष्प्रभाव हिन्दी में छपवाना चाहते थे। मगर अंधे स्वार्थ व धन के लोभ के कारण मानव-स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने वाले दवाई बनाने वाली कंपनियों के संगठन ने उन पर रोक नहीं लगने दी। ऐसा हमने-आपने सुना है।)

अतः हे भारतवासियों! हानिकारक रसायनों से और कई विकृतियों से भरी हुई एलोपैथी दवाइयों को अपने शरीर में डालकर अपने भविष्य को अंधकारमय न बनायें।

Monday, February 27, 2017

भ्रष्ट मीडिया से लोहा ले रहे है ट्रंप!!

भ्रष्ट मीडिया से लोहा ले रहे है ट्रंप!!

उनका कहना है कि "लोगों की दुश्मन है मीडिया"!!

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप की भले ही कुछ लोग आलोचना करते हो लेकिन वे दुनिया में पहले ऐसे बहादुर शख्स हैं जो राष्ट्रपति पद पर होते हुए भी मीडिया की बेईमानी के खिलाफ लोहा ले रहे हैं ।
​RealDonaldTrump is first President of America, is such a Brave man who is constantly Fighting Against #Unscrupulous and #CorruptMedia420
उन्होंने राष्ट्रपति पद ग्रहण करते ही मीडिया की बेईमानी पर बोलना चालू किया था ।
उनके शपथ ग्रहण समारोह के समय दर्शकों की संख्‍या कम बताने पर उन्होंने मीडिया को चेतावनी देकर कहा गया था कि गलत रिपोर्टिंग के लिए भुगतना पड़ेगा खामियाजा ।

उनका कहना था कि करीब एक मिलियन या डेढ़ मिलियन लोग उनके शपथ ग्रहण समारोह में आए थे पर चैनल वालों ने वह जगह न दिखाकर जो जगह एकदम खाली थी वो दिखाई जहां पर शायद कोई नहीं था । मीडिया को इस झूठ की कीमत चुकानी होगी।

ट्रंप ने सीआईए के हेडक्‍वार्टर में कहा कि, 'मीडिया के लोग धरती पर मानव जाति में सबसे बेईमान हैं।' 


रैली में मीडिया पर जमकर बरसे ट्रंप!!

फ्लोरिडा में एक रैली के दौरान ट्रंप ने मीडिया पर जमकर निशाना साधा और कहा कि मीडिया फर्जी और बेईमान है। 

ट्रंप ने मेलबर्न में शनिवार को करीब 9000 लोगों की भीड़ को संबोधित करते हुए कहा कि मीडिया अपनी खबरों में सच बताना नहीं चाहता।

ट्रंप ने मीडिया को समस्याओं और भ्रष्ट प्रणाली का हिस्सा बताया।  उन्होंने कहा कि,‘मीडिया का अपना खुद का एजेंडा है और उनका एजेंडा आपका एजेंडा नहीं है। 

 व्हाइट हाउस में बहुत सुचारु रूप से काम चल रहा है। यह बेईमान मीडिया एक के बाद एक झूठी और फर्जी खबर प्रकाशित करती है, बिना किसी सूत्र के। यहां तक कि वे कहते हैं कि उनके पास सूत्र हैं।’


मीडिया लोगों का दुश्मन है!!

ट्रंप ने ट्वीट किया, ‘‘Fake News’ मीडिया (नाकाम हो रहे एनवाईटाइम्स, एनबीसीन्यूज, एबीसी, सीबीएस, सीएनएन) मेरा दुश्मन नहीं है, वह अमेरिकी लोगों का दुश्मन है ।’’
 
उन्होंने अपने उस बयान के एक दिन बाद यह तीखा हमला किया है जिसमें उन्होंने कहा था कि उनका प्रशासन अच्छी तरह काम कर रहा है और व्हाइट हाउस के भीतर कोई ‘अव्यवस्था’ नहीं है जैसा कि मीडिया की ‘झूठी’ रिपोर्टों में बताया जा रहा है । 

ट्रंप ने मीडिया की आलोचना करते हुए जो यह ट्वीट की है वह कुछ ही घंटों में वायरल हो गई। इस ट्वीट को 28,000 लोगों ने रीट्वीट और 85,000 ने लाइक किया है । इस बीच ‘फॉक्स न्यूज’ ने एक ओपिनियन पोल में कहा कि 42 के मुकाबले 45 प्रतिशत मतदाताओं का यह कहना है कि व्हाइट हाउस मीडिया की तुलना में ज्यादा सच्चा है ।

व्हाइट हाउस की प्रेसवार्ता से बीबीसी, न्यूयार्क टाइम्स बाहर!!

कंजरवेटिव पॉलिटिकल एक्शन कांग्रेस (सीपीएसी) में दिए अपने संबोधन में पहले तेरह मिनट तक वो मीडिया की आलोचना करते रहे ।

मैरीलैंड में हुए ट्रंप के भाषण के कुछ घंटे बाद ही मीडिया और ट्रंप के रिश्तों में नया टकराव देखने को मिला ।

व्हाइट हाउस में ट्रंप के प्रवक्ता शॉन स्पाइसर की प्रेस वार्ता में बीबीसी, द न्यूयॉर्क टाइम्स, और सीएनएन जैसे संस्थानों के पत्रकारों को शामिल ही नहीं होने दिया गया ।


पत्रकारों के वार्षिक समारोह से दूर रहेंगे ट्रंप!!

पत्रकारों का वार्षिक समारोह अमेरिका में 1920 से चला आ रहा है इस बार 29 अप्रैल को व्हाइट हाउस में आयोजित होने वाला है उसमें ट्रंप ने शामिल नहीं होने की घोषणा की है। ट्रंप कई दशकों में व्हाइट हाउस करेस्पोंडेंट्स एसोसिएशन के सालाना डिनर में नहीं जाने वाले पहले राष्ट्रपति होंगे। ट्रंप ने माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर लिखा कि, मैं व्हाइट हाउस करेस्पोंडेंट्स एसोसिएशन के डिनर में इस साल भाग नहीं लूंगा। 


अभी तक तो आम जनता एवं सुप्रसिद्ध हस्तियों द्वारा मीडिया के खिलाफ आवाज उठाई गई थी लेकिन अब राष्ट्रपति पद पर रहते हुए भी ट्रंप ने मीडिया की बेईमानी से लोहा लेना शुरू कर दिया है ।

अब मीडिया वालों की दोगली एवं कपट भरी रणनीति का चेहरा दुनिया के सामने आ चुका है!!

मीडिया टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग पॉइंट ) और पैसे की लालच में अंधाधुन खबरें छापते हैं। हर गांव में हर मौहल्ले में दिन भर में कुछ न कुछ तो खबर होती है लेकिन उसको नही दिखाते है उनको जिस खबर का पैसा मिलता हो या टीआरपी मिलती हो उसी खबर को ही छापते और दिखाते हैं ।

भारतीय मीडिया भी हमेशा से हिंदू विरोधी न्यूज दिखाकर समाज को गुमराह करती आ रही है शायद इस एजेंडे के पीछे का मकसद भारत में रहकर भारत की संस्कृति को बर्बाद कर देना ही है ।

अतः बेईमान, भ्रष्ट मीडिया की खबरों से सावधान रहें!!
वो समय और था जब पत्रकारिता समाज तक सच्चाई पहुँचाने का साधन थी आज मीडिया बन चुकी है ब्लैकमेलिंग का धंधा!!

Sunday, February 26, 2017

चन्द्रशेखर आजाद बलिदान दिवस - 27 फरवरी

चन्द्रशेखर आजाद बलिदान दिवस - 27 फरवरी

चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को एक आदिवासी ग्राम भाबरा में हुआ था।
काकोरी ट्रेन डकैती और साण्डर्स की हत्या में सम्मिलित निर्भीक महान देशभक्त व क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अहम स्थान रखता है।

ऐतिहासिक दृष्टि से वे भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के स्वतंत्रता सेनानी थे। वे पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल व सरदार भगत सिंह सरीखे क्रान्तिकारियों के अनन्यतम साथियों में से थे। 
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सन् 1922 में गाँधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन को अचानक बन्द कर देने के कारण उनकी विचारधारा में बदलाव आया और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसियेशन के सक्रिय सदस्य बन गये। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में पहले 9 अगस्त 1925 को काकोरी काण्ड किया और फरार हो गये। इसके पश्चात् सन् 1927 में 'बिस्मिल' के साथ 4 प्रमुख साथियों के बलिदान के बाद उन्होंने उत्तर भारत की सभी क्रान्तिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसियेशन का गठन किया तथा भगत सिंह के साथ लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला सॉण्डर्स का हत्या करके लिया एवं दिल्ली पहुँच कर असेम्बली बम काण्ड को अंजाम दिया।


चंद्रशेखर आजाद का आत्म-बलिदान!!

साण्डर्स-वध और दिल्ली एसेम्बली बम काण्ड में फाँसी की सजा पाये तीन अभियुक्तों- भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव ने अपील करने से साफ मना कर ही दिया था। अन्य सजायाफ्ता अभियुक्तों में से सिर्फ 3 ने ही प्रिवी कौन्सिल में अपील की। 11 फरवरी 1931 को लन्दन की प्रिवी कौन्सिल में अपील की सुनवाई हुई। इन अभियुक्तों की ओर से एडवोकेट प्रिन्ट ने बहस की अनुमति माँगी थी किन्तु उन्हें अनुमति नहीं मिली और बहस सुने बिना ही अपील खारिज कर दी गयी। चन्द्रशेखर आजाद ने मृत्यु दण्ड पाये तीनों प्रमुख क्रान्तिकारियों की सजा कम कराने का काफी प्रयास किया। वे उत्तर प्रदेश की हरदोई जेल में जाकर गणेशशंकर विद्यार्थी से मिले। विद्यार्थी ने उन्हें इलाहाबाद जाकर जवाहर लाल नेहरू से मिलने को कहा। चंद्रशेखर आजाद जब नेहरू से मिलने आनंद भवन गए तो उन्होंने चंद्रशेखर की बात सुनने से भी इन्कार कर दिया। गुस्से में वहाँ से निकलकर चंद्रशेखर आजाद अपने साथी सुखदेव राज के साथ एल्फ्रेड पार्क चले गए। किसी मुखबिर ने पुलिस को यह सूचना दी कि चन्द्रशेखर आजाद  'अल्फ़्रेड पार्क' में अपने एक साथी के साथ बैठे हुए हैं। वह 27 फरवरी 1931 का दिन था। चन्द्रशेखर आजाद अपने साथी सुखदेव राज के साथ बैठकर विचार–विमर्श कर रहे थे। मुखबिर की सूचना पर पुलिस अधीक्षक 'नाटबाबर' ने आजाद को इलाहाबाद के अल्फ़्रेड पार्क में घेर लिया। "तुम कौन हो" कहने के साथ ही उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना नाटबाबर ने अपनी गोली आजाद पर छोड़ दी। नाटबाबर की गोली चन्द्रशेखर आजाद की जाँघ में जा लगी। आजाद ने घिसटकर एक जामुन के वृक्ष की ओट लेकर अपनी गोली दूसरे वृक्ष की ओट में छिपे हुए नाटबाबर के ऊपर दाग दी। आजाद का निशाना सही लगा और उनकी गोली ने नाटबाबर की कलाई तोड़ दी। एक घनी झाड़ी के पीछे सी.आई.डी. इंस्पेक्टर विश्वेश्वर सिंह छिपा हुआ था, उसने स्वयं को सुरक्षित समझकर आजाद को एक गाली दे दी। गाली को सुनकर आजाद को क्रोध आया। जिस दिशा से गाली की आवाज आई थी, उस दिशा में आजाद ने अपनी गोली छोड़ दी। निशाना इतना सही लगा कि आजाद की गोली ने विश्वेश्वरसिंह का जबड़ा तोड़ दिया।


शहादत!!

बहुत देर तक आजाद ने जमकर अकेले ही मुकाबला किया। उन्होंने अपने साथी सुखदेवराज को पहले ही भगा दिया था। आखिर पुलिस की कई गोलियाँ आजाद के शरीर में समा गई थी । उनके माउजर में केवल एक आखिरी गोली बची थी तो उन्हें पुलिस का सामना करना मुश्किल लगा। चंद्रशेखर आजाद ने  यह प्रण लिया हुआ था कि वह कभी भी जीवित पुलिस के हाथ नहीं आएंगे। इसी प्रण को निभाते हुए एल्फ्रेड पार्क में 27 फरवरी 1931 को उन्होंने वह बची हुई गोली स्वयं पर दाग के आत्म-बलिदान कर लिया।

 पुलिस के अंदर चंद्रशेखर आजाद का भय इतना था कि किसी को भी उनके मृत शरीर के पास जाने तक की हिम्मत नहीं थी। उनके मृत शरीर पर गोलियाँ चलाकर पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद ही चंद्रशेखर की मृत्यु की पुष्टि की गई।

 
पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिये चन्द्रशेखर आजाद का अन्तिम संस्कार कर दिया था। जैसे ही आजाद के बलिदान की खबर जनता को लगी सारा इलाहाबाद अलफ्रेड पार्क में उमड़ पड़ा । जिस वृक्ष के नीचे आजाद शहीद हुए थे लोग उस वृक्ष की पूजा करने लगे। वृक्ष के तने के इर्द-गिर्द झण्डियाँ बाँध दी गयी। लोग उस स्थान की माटी को कपडों में शीशियों में भरकर ले जाने लगे। समूचे शहर में आजाद की बलिदान की खबर से जब‍रदस्त तनाव हो गया। शाम होते-होते सरकारी प्रतिष्ठानों प‍र हमले होने लगे। लोग सड़को पर आ गये।

आजाद के बलिदान की खबर जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू को मिली तो उन्होंने तमाम काँग्रेसी नेताओं व अन्य देशभक्तों को इसकी सूचना दी। बाद में शाम के वक्त लोगों का हुजूम पुरुषोत्तम दास टंडन के नेतृत्व में इलाहाबाद के रसूलाबाद शमशान घाट पर कमला नेहरू को साथ लेकर पहुँचा। अगले दिन आजाद की अस्थियाँ चुनकर युवकों का एक जुलूस निकाला गया। इस जुलूस में इतनी ज्यादा भीड़ थी कि इलाहाबाद की मुख्य सड़को पर जाम लग गया। ऐसा लग रहा था जैसे इलाहाबाद की जनता के रूप में सारा हिन्दुस्तान अपने इस सपूत को अंतिम विदाई देने उमड़ पड़ा हो। जुलूस के बाद सभा हुई। सभा को शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी प्रतिभा सान्याल ने सम्बोधित करते हुए कहा कि जैसे बंगाल में खुदीराम बोस के बलिदान के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया वैसे ही आजाद को भी सम्मान मिलेगा। सभा को कमला नेहरू तथा पुरुषोत्तम दास टंडन ने भी सम्बोधित किया। इससे कुछ ही दिन पूर्व 6 फरवरी 1927 को पण्डित मोतीलाल नेहरू के देहान्त के बाद आजाद भेष बदलकर उनकी शवयात्रा में शामिल हुए थे।

व्यक्तिगत जीवन!!

चंद्रशेखर आजाद को वेष बदलना बहुत अच्छी तरह आता था।वह रूसी क्रान्तिकारी की कहानियों से बहुत प्रभावित थे। उनके पास हिन्दी में लेनिन की लिखी पुस्तक भी थी। किंतु उनको स्वयं पढ़ने से अधिक दूसरों को पढ़कर सुनाने में अधिक आनंद आता था।चंद्रशेखर आजाद सदैव सत्य बोलते थे।चंद्रशेखर आजाद ने साहस की नई कहानी लिखी। उनके बलिदान से स्वतंत्रता के लिए आंदोलन तेज हो गया। हजारों युवक स्‍वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े।आजाद के शहीद होने के सोलह वर्षों के बाद 15 अगस्त सन् 1947 को भारत की आजादी का उनका सपना पूरा हुआ।

बाद में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जिस पार्क में उनका निधन हुआ था उसका नाम परिवर्तित कर चंद्रशेखर आजाद पार्क और मध्य प्रदेश के जिस गांव में वह रहे थे उसका धिमारपुरा नाम बदलकर आजादपुरा रखा गया।

यह देश का दुर्भाग्य है कि आज हमें चॉक्लेट डे, वेलेंटाइन डे, फ्रेंडशिप डे जैसे विदेशी दिवस तो याद रहते हैं लेकिन जिन देशभक्तों ने अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरो से बंधे देश को छुड़ाने के लिए बलिदान दिया वो किसी को याद नही ।

जरा विचार कीजिये कि देश को आजादी दिलाने के लिए अपने प्राणों की आहुति देनेवाले इन वीर शहीदों के सपने को हम कहाँ तक साकार कर सके हैं..???

हमने उनके बलिदानों का कितना आदर किया है...???

वास्तव में, हमने उन अमर शहीदों के बलिदानों को कोई सम्मान ही नहीं दिया है । तभी तो स्वतंत्रता के 70 वर्ष बाद भी हमारा देश पश्चिमी संस्कृति की गुलामी में जकड़ा हुआ है।

इन महापुरुषों की सच्ची पुण्यतिथि तो तभी मनाई जाएगी, जब प्रत्येक भारतवासी उनके जीवन को अपना आदर्श बनायेंगे, उनके सपनों को साकार करेंगे तथा जैसे भारत का निर्माण वे महापुरुष करना चाहते थे, वैसा ही हम करके दिखायें । 
यही उनका बलिदान दिवस मनाना है ।

Wednesday, February 22, 2017

पब्लिक जो मीडिया दिखाती हैं उसको ही सच मान बैठती है : श्री गुरुमाँ कंचनगीरीजी

पब्लिक जो मीडिया दिखाती हैं उसको ही सच मान बैठती है : श्री गुरुमाँ कंचनगीरीजी 

जूना अखाड़ा राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं महाकाल मानव सेवा संस्थान की श्री गुरुमाँ कंचनगीरीजी ने एक निजी चैनल में अपना इंटरव्यू देते हुए कहा कि देखिए! आज की डेट में सभी साधु-संतों को टारगेट किया जा रहा है। कारण बस यही है कि हमारे हिन्दू धर्म में कोई भी बलपूर्वक कभी सामने नहीं आते हैं ।
Public-believe-on-media-and-not-on-the-innocence-of-saint

अगर कोई संत फंस जाते हैं तो बाकी सब चुप बैठ जाते हैं । संत संस्कृति का प्रचार करते हैं, जगह-जगह जाकर प्रवचन के द्वारा लोगों में हिन्दू संस्कृति का ज्ञान देना ये बहुत बड़ा कार्य है जो हिन्दू संतों द्वारा किया जा रहा है इसलिए उन्हें टारगेट किया जा रहा है जिससे हिंदुत्व खत्म किया जा सके । लेकिन हम सब को आगे आना पड़ेगा, उसके लिए प्रयास करना पड़ेगा । 

कुछ मीडिया भी कारण बन रही है । जब भी किसी संत को टारगेट किया गया है तो उतना ही ज्यादा उनके बारे में मीडिया द्वारा गलत दिखाया जाता है और पब्लिक की सोच भी ऐसी हो गई है कि जैसा मीडिया दिखाती है उसको ही सच मान बैठती हैं । 

मीडिया जो है वो असत्य को आगे लाके दिखाती है, और हम सत्य को सामने लाने की कोशिश करते हैं तो हमारे पीछे प्रशासन मीडिया सभी पड़ते हैं । 


तो अपनी सोच को बदलना पड़ेगा, पब्लिक को अपने आपको बदलना पड़ेगा । अपने आप से विवेक अंदर रखना पड़ेगा।

जैसे संत आसारामजी बापू हैं कि इस ऐज (80 वर्ष की उम्र) में वो इस प्रकार का कार्य कर ही नहीं सकते हैं । उनके उपर इल्जाम लगे हैं, आरोप प्रति आरोप लगे हैं । 

तो मैं ये कहना चाहूंगी लोगों को, खुद ही एकांत में सोचे कि क्या ये अवस्था ये करने की है..?? 

तो यही अपील करना चाहूंगी लोगों से कि आप कम से कम सच को जानने की कोशिश करें। जो संत (आसारामजी बापू जैसे) हैं हजार संतों के बराबर हैं ।

आज जिस परिस्थिति में संत आसारामजी बापू जेल में हैं । वो अपने दुःख का विषय है। तो हम सबको आगे आना चाहिए । 

मैंने संतो के लिए मुहीम भी छेड़ दी है महाकाल मानव सेवा की तरफ से । अभी हम साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के लिए भी कुछ न कुछ कार्य करेगें और संत आसारामजी बापू के लिए हमने पहले से ही मुहीम छेड़ी हुई है। बहुत जल्द ही आप हमारी टी.वी चैनल पर  देखेगें गुरुमाँ की धर्म धारा जितने भी संत हैं जिन पर आरोप लगाया गया है उनको उस अदालत में बुलाया जाएगा ।

गौरतलब है कि साध्वी प्रज्ञा 9 साल से और संत आसारामजी बापू 40 महीने से जेल में बंद है जबकि उनपर अभीतक एक भी आरोप सिद्ध नही हुआ है यहाँ तक कि उनको क्लीनचिट भी मिल चुकी है लेकिन उनको अभीतक जमानत नही मिलने पर गुरु माँ कंचनगिरी ने उनकी शीघ्र रिहाई के लिए मुहीम छेड़ दी है ।

आपको बता दें कि इस तरह से पहले भी साधु-संत एवं कई हिन्दू संगठन साध्वी प्रज्ञा और बापू आसारामजी की शीघ्र रिहाई के लिये कई आंदोलन कर चुके हैं और सरकार से मांग भी की है कि साध्वी प्रज्ञा और बापू आसारामजी को षड़यंत्र के तहत फंसाया गया है जिसके कई प्रमाण भी  मिले हैं पर उनको जमानत जैसे मौलिक अधिकार से भी दूर रखा जा रहा है।
आखिर क्यों..???

Tuesday, February 21, 2017

आइये जाने #राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक तथा महान विचारक श्री माधव सदाशिव गोलवलकर

🚩श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर जयंती 22 फरवरी!!

🚩आइये जाने #राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक तथा महान विचारक
#श्री माधव सदाशिव गोलवलकर (श्रीगुरुजी ) के बारे में...

🚩श्री #गोलवलकर गुरूजी का जन्म माघ कृष्ण 11 संवत 1963 तदनुसार 19 फरवरी 1906 को महाराष्ट्र के रामटेक में हुआ था। वे अपने माता-पिता की चौथी संतान थे। उनके पिता का नाम श्री सदाशिव राव उपाख्य 'भाऊ जी' तथा माता का श्रीमती लक्ष्मीबाई उपाख्य 'ताई' था। उनका बचपन में नाम #माधव रखा गया पर परिवार में वे मधु के नाम से ही पुकारे जाते थे। पिताश्री सदाशिव राव प्रारम्भ में डाक-तार विभाग में कार्यरत थे परन्तु बाद में सन् 1908 में उनकी नियुक्ति शिक्षा विभाग में अध्यापक पद पर हो गयी।

🚩शिक्षा के साथ अन्य अभिरुचियाँ!!

माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर

🚩मधु जब मात्र दो वर्ष के थे तभी से उनकी शिक्षा प्रारम्भ हो गयी थी। पिताश्री भाऊजी जो भी उन्हें पढ़ाते थे उसे वे सहज ही कंठस्थ कर लेते थे। बालक मधु में कुशाग्र बुध्दि, ज्ञान की लालसा, असामान्य स्मरण शक्ति जैसे गुणों का समुच्चय विकास बचपन से ही हो रहा था। सन् 1919 में उन्होंने 'हाई स्कूल की प्रवेश परीक्षा' में विशेष #योग्यता दिखाकर छात्रवृत्ति प्राप्त की। सन् 1922 में 16 वर्ष की आयु में माधव ने मैट्रिक की परीक्षा चाँदा (अब चन्द्रपुर) के 'जुबली हाई स्कूल' से उत्तीर्ण की। तत्पश्चात् सन् 1924 में उन्होंने #नागपुर की ईसाई मिशनरी द्वारा संचालित 'हिस्लाप कॉलेज' से विज्ञान विषय में इण्टरमीडिएट की परीक्षा विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण की। #अंग्रेजी विषय में उन्हें प्रथम पारितोषिक मिला। वे भरपूर हॉकी तो खेलते ही थे कभी-कभी टेनिस भी खेल लिया करते थे। इसके अतिरिक्त व्यायाम का भी उन्हें शौक था। मलखम्ब के करतब, पकड़ एवं कूद आदि में वे काफी निपुण थे। विद्यार्थी जीवन में ही उन्होंने बाँसुरी एवं सितार वादन में भी अच्छी प्रवीणता हासिल कर ली थी।

🚩विश्वविद्यालय में ही आध्यात्मिक रुझान!!

🚩इण्टरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद माधवराव के #जीवन में एक नये दूरगामी परिणाम वाले अध्याय का प्रारम्भ सन् 1924 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश के साथ हुआ। सन् 1926 में उन्होंने बी.एससी. और सन् 1928 में एम.एससी. की परीक्षायें भी प्राणि-शास्त्र विषय में प्रथम श्रेणी के साथ उत्तीर्ण की। इस तरह उनका विद्यार्थी जीवन अत्यन्त यशस्वी रहा। विश्वविद्यालय में बिताये चार वर्षों के कालखण्ड में उन्होंने विषय के अध्ययन के अलावा "संस्कृत महाकाव्यों, पाश्चात्य दर्शन, श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द की ओजपूर्ण एवं प्रेरक 'विचार सम्पदा', भिन्न-भिन्न उपासना-पंथों के प्रमुख ग्रंथों तथा शास्त्रीय विषयों के अनेक ग्रंथों का आस्थापूर्वक पठन किया" । इसी बीच उनकी रुचि आध्यात्मिक जीवन की ओर जागृत हुई। एम.एससी. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् वे प्राणि-शास्त्र विषय में 'मत्स्य जीवन' पर शोध कार्य हेतु मद्रास (चेन्नई) के मत्स्यालय से जुड़ गये। एक वर्ष के दौरान ही उनके पिता श्री भाऊजी सेवानिवृत्त हो गये, जिसके कारण वह श्री गुरूजी को पैसा भेजने में असमर्थ हो गये। इसी मद्रास-प्रवास के दौरान वे गम्भीर रूप से बीमार पड़ गये। चिकित्सक का विचार था कि यदि सावधानी नहीं बरती तो रोग गम्भीर रूप धारण कर सकता है। दो माह के इलाज के बाद वे रोगमुक्त तो हुए परन्तु उनका स्वास्थ्य पूर्णरूपेण से पूर्ववत् नहीं रहा। मद्रास प्रवास के दौरान जब वे शोध में कार्यरत थे तो एक बार हैदराबाद का निजाम मत्स्यालय देखने आया। नियमानुसार प्रवेश-शुल्क दिये बिना उसे प्रवेश देने से श्री गुरूजी ने इन्कार कर दिया । आर्थिक तंगी के कारण श्री गुरूजी को अपना शोध-कार्य अधूरा छोड़ कर अप्रैल 1929 में नागपुर वापस लौटना पड़ा। उनमें अद्भुत क्षमता थी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने की।

🚩प्राध्यापक के रूप में श्रीगुरूजी!!

🚩नागपुर आकर भी उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहा। इसके साथ ही उनके परिवार की आर्थिक स्थिति भी अत्यन्त खराब हो गयी थी। इसी बीच #बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से उन्हें निर्देशक पद पर सेवा करने का प्रस्ताव मिला। 16 अगस्त सन् 1931 को श्री गुरूजी ने बनारस हिन्दू #विश्वविद्यालय के प्राणि-शास्त्र विभाग में निर्देशक का पद संभाल लिया। चूँकि यह अस्थायी नियुक्ति थी। इस कारण वे प्राय: चिन्तित भी रहा करते थे।

🚩अपने विद्यार्थी जीवन में भी माधव राव अपने मित्रों के अध्ययन में उनका मार्गदर्शन किया करते थे और अब तो अध्यापन उनकी आजीविका का साधन ही बन गया था। उनके अध्यापन का विषय यद्यपि प्राणि-विज्ञान था, विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनकी प्रतिभा पहचान कर उन्हें बी.ए. की कक्षा के छात्रों को अंग्रेजी और राजनीति शास्त्र भी पढ़ाने का अवसर दिया। अध्यापक के नाते माधव राव अपनी विलक्षण प्रतिभा और योग्यता से छात्रों में इतने अधिक लोकप्रिय हो गये कि उनके छात्र उनको गुरुजी के नाम से सम्बोधित करने लगे। इसी नाम से वे आगे चलकर जीवन भर जाने गये। माधव राव यद्यपि विज्ञान के परास्नातक थे, फिर भी आवश्यकता पड़ने पर अपने छात्रों तथा मित्रों को अंग्रेजी, अर्थशास्त्र, गणित तथा दर्शन जैसे अन्य विषय भी पढ़ाने को सदैव तत्पर रहते थे । यदि उन्हें पुस्तकालय में पुस्तकें नहीं मिलती थी, तो वे उन्हें खरीद कर और पढ़कर जिज्ञासी छात्रों एवं मित्रों की सहायता करते रहते थे। उनके वेतन का बहुतांश अपने होनहार छात्र-मित्रों की फीस भर देने अथवा उनकी पुस्तकें खरीद देने में ही व्यय हो जाया करता था।

🚩संघ प्रवेश!!

🚩सबसे पहले "डॉ॰ हेडगेवार" के द्वारा #काशी विश्वविद्यालय भेजे गए नागपुर के #स्वयंसेवक #भैयाजी #दाणी के द्वारा #श्री #गुरूजी #संघ के सम्पर्क में आये और उस शाखा के संघचालक भी बने। 1937 में वो नागपुर वापस आ गए। नागपुर में श्री गुरूजी के जीवन में एक दम नए मोड़ का आरम्भ हो गया। "डॉ हेडगेवार" के सानिध्य में उन्होंने एक अत्यंत प्रेरणा दायक राष्ट्र समर्पित व्यक्तित्व को देखा। किसी आप्त व्यक्ति के द्वारा इस विषय पर पूछने पर उन्होंने कहा- "मेरा रुझान राष्ट्र संगठन कार्य की ओर प्रारम्भ से है। यह कार्य संघ में रहकर अधिक परिणामकारिता से मैं कर सकूँगा ऐसा मेरा विश्वास है। इसलिए मैंने संघ कार्य में ही स्वयं को समर्पित कर दिया। मुझे लगता है स्वामी विवेकानंद के तत्वज्ञान और कार्यपद्धति से मेरा यह आचरण सर्वथा सुसंगत है।" 1938 के पश्चात संघ कार्य को ही उन्होंने अपना जीवन कार्य मान लिया। #डॉ हेडगेवार के साथ निरंतर रहते हुये अपना सारा ध्यान संघ कार्य पर ही केंद्रित किया। इससे डॉ हेडगेवार जी का ध्येय पूर्ण हुआ।

🚩द्वितीय संघचालक हेतु नियुक्ति

🚩#राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक "डॉ हेडगेवार" के प्रति सम्पूर्ण समर्पण भाव और प्रबल आत्म संयम होने की वजह से 1939 में #माधव सदाशिव गोलवलकर को संघ का सरकार्यवाह नियुक्त किया गया। 1940 में "हेडगेवार" का ज्वर बढ़ता ही गया और अपना अंत समय जानकर उन्होंने उपस्थित कार्यकर्ताओं के सामने माधव को अपने पास बुलाया और कहा "अब आप ही संघ का कार्य सम्भालें"। 21 जून 1940 को हेडगेवार अनंत में विलीन हो गए।

🚩भारत छोड़ो- श्री गुरूजी का दृष्टिकोण!!

🚩9 अगस्त 1942 को बिना शक्ति के ही कांग्रेस ने अंग्रेजों के खिलाफ "भारत छोड़ो" आंदोलन छेड़ दिया। देश भर में बड़ा #आंदोलन शुरू तो हो गया, परन्तु असंगठित दिशाहीन होने से जनता की तरफ से कई प्रकार की तोड़ फोड़ होने लगी। सत्ताधारियों ने बड़ी क्रूरता से दमन नीतियाँ अपनाई। 2-3 महीने होते-होते आंदोलन की चिंगारी शांत हो गई। देश के सभी नेता कारागार में थे और उनकी रिहाई की कोई आशा दिखाई नहीं दे रही थी। श्री गुरूजी ने निर्णय किया था कि संघ प्रत्यक्ष रूप से तो आंदोलन में भाग नहीं लेगा किन्तु स्वयंसेवकों को व्यक्तिशः प्रेरित किया जाएगा।

🚩विभाजन संकट में अद्वितीय नेतृत्व!!

🚩16 अगस्त 1946 को मुहम्मद अली जिन्नाह ने सीधी कार्यवाही का दिन घोषित कर के हिन्दू हत्या का तांडव मचा दिया। उन्ही दिनों में श्री गुरूजी देश भर के अपने प्रत्येक भाषण में देश विभाजन के खिलाफ डट कर खड़े होने के लिए जनता का आह्वान करते रहे किन्तु कांग्रेसी नेतागण अखण्ड भारत के लिए लड़ने की मनः स्थिति में नहीं थे। पण्डित नेहरू ने भी स्पष्ट शब्दों में विभाजन को स्वीकार कर लिया था और 3 जून 1947 को इसकी घोषणा कर दी गई। एकाएक देश की स्थिति बदल गई। #इस कठिन समय में स्वयंसेवकों ने पाकिस्तान वाले भाग से हिंदुओं को सुरक्षित भारत भेजना शुरू किया। संघ का आदेश था कि जब तक आखिरी हिन्दू सुरक्षित ना आ जाए तब तक डटे रहना है। भीषण दिनों में #स्वयंसेवकों का अतुलनीय पराक्रम, रणकुशलता, त्याग और बलिदान की गाथा भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से लिखने लायक है। श्री गुरूजी भी इस कठिन घड़ी में पाकिस्तान के भाग में प्रवास करते रहे।

🚩संघ पर प्रतिबन्ध!!

🚩30 जनवरी 1948 को गांधी हत्या के मिथ्या आरोप में 4 फरवरी को संघ पर प्रतिबन्ध लगाया गया। #श्री गुरूजी को गिरफ्तार किया गया। देश भर में स्वयंसेवको की गिरफ्तारियां हुई। जेल में रहते हुए उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं का विस्तृत व्यक्तव्य भेजा जिसमें सरकार को मुहतोड़ जवाब दिया गया था। आह्वान किया गया था कि संघ पर आरोप सिद्ध करो या प्रतिबन्ध हटाओ। देश भर में यह स्वर गूंज उठा था। 26 फरवरी 1948 को देश के प्रधानमन्त्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को गृह मंत्री वल्लभ भाई पटेल ने अपने पत्र में लिखा था "गांधी हत्या के काण्ड में मैंने स्वयं अपना ध्यान लगाकर पूरी जानकारी प्राप्त की है। उस से जुड़े हुये सभी अपराधी लोग पकड़ में आ गए हैं। उनमें एक भी व्यक्ति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नहीं है।"

🚩9 दिसम्बर 1948 को #सत्याग्रह नाम के इस आंदोलन की शुरुआत होते ही कुछ 4-5 हजार बच्चों का यह आंदोलन है ऐसा मानकर नेतागण ने इसका मजाक उड़ाया। लेकिन उसके उलट किसी भी कांग्रेसी आंदोलन में इतनी संख्या नहीं थी। 77090 स्वयंसेवकों ने विभिन्न जेलों को भर दिया। आखिरकार संघ को लिखित #संविधान बनाने का आदेश दे कर प्रतिबन्ध हटा लिया गया और अब गांधी हत्या का इसमें जिक्र तक नहीं हुआ।

🚩तब #सरदार वल्लभभाई पटेल ने गुरूजी को भेजे हुए अपने सन्देश में लिखा कि "संघ पर से पाबन्दी उठाने पर मुझे जितनी खुशी हुई इसका प्रमाण तो उस समय जो लोग मेरे निकट थे वे ही बता सकते हैं... मैं आपको अपनी शुभकामनाएं भेजता हूँ।"

🚩चीन आक्रमण के दौरान श्री गुरूजी का मार्गदर्शन!!

🚩श्री गुरूजी ने चीनी आक्रमण शुरू होते ही जो मार्ग दर्शन दिया उसके परिप्रेक्ष्य में स्वयंसेवक युद्ध प्रयत्नों में जनता का समर्थन जुटाने तथा उनका मनोबल दृढ करने में जुट गए। उनके सामयिक सहयोग का महत्व पण्डित नेहरू को भी स्वीकार करना पड़ा और उन्होंने सन् 1963 में गणतंत्र दिवस के पथ संचलन में कुछ कांग्रेसियों की आपत्ति के बाद भी संघ के स्वयंसेवकों को भाग लेने हेतु आमंत्रण भिजवाया। कहना न होगा कि #संघ के तीन हजार गणवेषधारी स्वयंसेवकों के घोष की ताल पर कदम मिलाकर चलना उस दिन के कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण था।

🚩सन् 1940 से 1973 इन 33 वर्षों में श्रीगुरुजी नें संघ को #अखिल भारतीय स्वरुप प्रदान किया। इस कार्यकाल में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारप्रणाली को सूत्रबध्द किया। श्रीगुरुजी, अपनी विचार शक्ति व कार्यशक्ति से विभिन्न क्षेत्रों एवम् संघटनाओं के कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणास्रोत बनें। #श्रीगुरुजी का जीवन अलौकिक था, राष्ट्रजीवन के विभिन्न पहलुओं पर उन्होंने मूलभूत एवम् क्रियाशील मार्गदर्शन किया ।



🚩कैसे वीर हो गए इस देश में, जब धर्म की बात आयी तो शास्त्र उठाया और जब कर्म की बात आयी तो शस्त्र उठाने में भी पीछे नही हटे....!

श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर जयंती 22 फरवरी

🚩श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर जयंती 22 फरवरी!!

🚩आइये जाने #राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक तथा महान विचारक
#श्री माधव सदाशिव गोलवलकर (श्रीगुरुजी ) के बारे में...

🚩श्री #गोलवलकर गुरूजी का जन्म माघ कृष्ण 11 संवत 1963 तदनुसार 19 फरवरी 1906 को महाराष्ट्र के रामटेक में हुआ था। वे अपने माता-पिता की चौथी संतान थे। उनके पिता का नाम श्री सदाशिव राव उपाख्य 'भाऊ जी' तथा माता का श्रीमती लक्ष्मीबाई उपाख्य 'ताई' था। उनका बचपन में नाम #माधव रखा गया पर परिवार में वे मधु के नाम से ही पुकारे जाते थे। पिताश्री सदाशिव राव प्रारम्भ में डाक-तार विभाग में कार्यरत थे परन्तु बाद में सन् 1908 में उनकी नियुक्ति शिक्षा विभाग में अध्यापक पद पर हो गयी।

🚩शिक्षा के साथ अन्य अभिरुचियाँ!!

माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर

🚩मधु जब मात्र दो वर्ष के थे तभी से उनकी शिक्षा प्रारम्भ हो गयी थी। पिताश्री भाऊजी जो भी उन्हें पढ़ाते थे उसे वे सहज ही कंठस्थ कर लेते थे। बालक मधु में कुशाग्र बुध्दि, ज्ञान की लालसा, असामान्य स्मरण शक्ति जैसे गुणों का समुच्चय विकास बचपन से ही हो रहा था। सन् 1919 में उन्होंने 'हाई स्कूल की प्रवेश परीक्षा' में विशेष #योग्यता दिखाकर छात्रवृत्ति प्राप्त की। सन् 1922 में 16 वर्ष की आयु में माधव ने मैट्रिक की परीक्षा चाँदा (अब चन्द्रपुर) के 'जुबली हाई स्कूल' से उत्तीर्ण की। तत्पश्चात् सन् 1924 में उन्होंने #नागपुर की ईसाई मिशनरी द्वारा संचालित 'हिस्लाप कॉलेज' से विज्ञान विषय में इण्टरमीडिएट की परीक्षा विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण की। #अंग्रेजी विषय में उन्हें प्रथम पारितोषिक मिला। वे भरपूर हॉकी तो खेलते ही थे कभी-कभी टेनिस भी खेल लिया करते थे। इसके अतिरिक्त व्यायाम का भी उन्हें शौक था। मलखम्ब के करतब, पकड़ एवं कूद आदि में वे काफी निपुण थे। विद्यार्थी जीवन में ही उन्होंने बाँसुरी एवं सितार वादन में भी अच्छी प्रवीणता हासिल कर ली थी।

🚩विश्वविद्यालय में ही आध्यात्मिक रुझान!!

🚩इण्टरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद माधवराव के #जीवन में एक नये दूरगामी परिणाम वाले अध्याय का प्रारम्भ सन् 1924 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश के साथ हुआ। सन् 1926 में उन्होंने बी.एससी. और सन् 1928 में एम.एससी. की परीक्षायें भी प्राणि-शास्त्र विषय में प्रथम श्रेणी के साथ उत्तीर्ण की। इस तरह उनका विद्यार्थी जीवन अत्यन्त यशस्वी रहा। विश्वविद्यालय में बिताये चार वर्षों के कालखण्ड में उन्होंने विषय के अध्ययन के अलावा "संस्कृत महाकाव्यों, पाश्चात्य दर्शन, श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द की ओजपूर्ण एवं प्रेरक 'विचार सम्पदा', भिन्न-भिन्न उपासना-पंथों के प्रमुख ग्रंथों तथा शास्त्रीय विषयों के अनेक ग्रंथों का आस्थापूर्वक पठन किया" । इसी बीच उनकी रुचि आध्यात्मिक जीवन की ओर जागृत हुई। एम.एससी. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् वे प्राणि-शास्त्र विषय में 'मत्स्य जीवन' पर शोध कार्य हेतु मद्रास (चेन्नई) के मत्स्यालय से जुड़ गये। एक वर्ष के दौरान ही उनके पिता श्री भाऊजी सेवानिवृत्त हो गये, जिसके कारण वह श्री गुरूजी को पैसा भेजने में असमर्थ हो गये। इसी मद्रास-प्रवास के दौरान वे गम्भीर रूप से बीमार पड़ गये। चिकित्सक का विचार था कि यदि सावधानी नहीं बरती तो रोग गम्भीर रूप धारण कर सकता है। दो माह के इलाज के बाद वे रोगमुक्त तो हुए परन्तु उनका स्वास्थ्य पूर्णरूपेण से पूर्ववत् नहीं रहा। मद्रास प्रवास के दौरान जब वे शोध में कार्यरत थे तो एक बार हैदराबाद का निजाम मत्स्यालय देखने आया। नियमानुसार प्रवेश-शुल्क दिये बिना उसे प्रवेश देने से श्री गुरूजी ने इन्कार कर दिया । आर्थिक तंगी के कारण श्री गुरूजी को अपना शोध-कार्य अधूरा छोड़ कर अप्रैल 1929 में नागपुर वापस लौटना पड़ा। उनमें अद्भुत क्षमता थी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने की।

🚩प्राध्यापक के रूप में श्रीगुरूजी!!

🚩नागपुर आकर भी उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहा। इसके साथ ही उनके परिवार की आर्थिक स्थिति भी अत्यन्त खराब हो गयी थी। इसी बीच #बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से उन्हें निर्देशक पद पर सेवा करने का प्रस्ताव मिला। 16 अगस्त सन् 1931 को श्री गुरूजी ने बनारस हिन्दू #विश्वविद्यालय के प्राणि-शास्त्र विभाग में निर्देशक का पद संभाल लिया। चूँकि यह अस्थायी नियुक्ति थी। इस कारण वे प्राय: चिन्तित भी रहा करते थे।

🚩अपने विद्यार्थी जीवन में भी माधव राव अपने मित्रों के अध्ययन में उनका मार्गदर्शन किया करते थे और अब तो अध्यापन उनकी आजीविका का साधन ही बन गया था। उनके अध्यापन का विषय यद्यपि प्राणि-विज्ञान था, विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनकी प्रतिभा पहचान कर उन्हें बी.ए. की कक्षा के छात्रों को अंग्रेजी और राजनीति शास्त्र भी पढ़ाने का अवसर दिया। अध्यापक के नाते माधव राव अपनी विलक्षण प्रतिभा और योग्यता से छात्रों में इतने अधिक लोकप्रिय हो गये कि उनके छात्र उनको गुरुजी के नाम से सम्बोधित करने लगे। इसी नाम से वे आगे चलकर जीवन भर जाने गये। माधव राव यद्यपि विज्ञान के परास्नातक थे, फिर भी आवश्यकता पड़ने पर अपने छात्रों तथा मित्रों को अंग्रेजी, अर्थशास्त्र, गणित तथा दर्शन जैसे अन्य विषय भी पढ़ाने को सदैव तत्पर रहते थे । यदि उन्हें पुस्तकालय में पुस्तकें नहीं मिलती थी, तो वे उन्हें खरीद कर और पढ़कर जिज्ञासी छात्रों एवं मित्रों की सहायता करते रहते थे। उनके वेतन का बहुतांश अपने होनहार छात्र-मित्रों की फीस भर देने अथवा उनकी पुस्तकें खरीद देने में ही व्यय हो जाया करता था।

🚩संघ प्रवेश!!

🚩सबसे पहले "डॉ॰ हेडगेवार" के द्वारा #काशी विश्वविद्यालय भेजे गए नागपुर के #स्वयंसेवक #भैयाजी #दाणी के द्वारा #श्री #गुरूजी #संघ के सम्पर्क में आये और उस शाखा के संघचालक भी बने। 1937 में वो नागपुर वापस आ गए। नागपुर में श्री गुरूजी के जीवन में एक दम नए मोड़ का आरम्भ हो गया। "डॉ हेडगेवार" के सानिध्य में उन्होंने एक अत्यंत प्रेरणा दायक राष्ट्र समर्पित व्यक्तित्व को देखा। किसी आप्त व्यक्ति के द्वारा इस विषय पर पूछने पर उन्होंने कहा- "मेरा रुझान राष्ट्र संगठन कार्य की ओर प्रारम्भ से है। यह कार्य संघ में रहकर अधिक परिणामकारिता से मैं कर सकूँगा ऐसा मेरा विश्वास है। इसलिए मैंने संघ कार्य में ही स्वयं को समर्पित कर दिया। मुझे लगता है स्वामी विवेकानंद के तत्वज्ञान और कार्यपद्धति से मेरा यह आचरण सर्वथा सुसंगत है।" 1938 के पश्चात संघ कार्य को ही उन्होंने अपना जीवन कार्य मान लिया। #डॉ हेडगेवार के साथ निरंतर रहते हुये अपना सारा ध्यान संघ कार्य पर ही केंद्रित किया। इससे डॉ हेडगेवार जी का ध्येय पूर्ण हुआ।

🚩द्वितीय संघचालक हेतु नियुक्ति

🚩#राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक "डॉ हेडगेवार" के प्रति सम्पूर्ण समर्पण भाव और प्रबल आत्म संयम होने की वजह से 1939 में #माधव सदाशिव गोलवलकर को संघ का सरकार्यवाह नियुक्त किया गया। 1940 में "हेडगेवार" का ज्वर बढ़ता ही गया और अपना अंत समय जानकर उन्होंने उपस्थित कार्यकर्ताओं के सामने माधव को अपने पास बुलाया और कहा "अब आप ही संघ का कार्य सम्भालें"। 21 जून 1940 को हेडगेवार अनंत में विलीन हो गए।

🚩भारत छोड़ो- श्री गुरूजी का दृष्टिकोण!!

🚩9 अगस्त 1942 को बिना शक्ति के ही कांग्रेस ने अंग्रेजों के खिलाफ "भारत छोड़ो" आंदोलन छेड़ दिया। देश भर में बड़ा #आंदोलन शुरू तो हो गया, परन्तु असंगठित दिशाहीन होने से जनता की तरफ से कई प्रकार की तोड़ फोड़ होने लगी। सत्ताधारियों ने बड़ी क्रूरता से दमन नीतियाँ अपनाई। 2-3 महीने होते-होते आंदोलन की चिंगारी शांत हो गई। देश के सभी नेता कारागार में थे और उनकी रिहाई की कोई आशा दिखाई नहीं दे रही थी। श्री गुरूजी ने निर्णय किया था कि संघ प्रत्यक्ष रूप से तो आंदोलन में भाग नहीं लेगा किन्तु स्वयंसेवकों को व्यक्तिशः प्रेरित किया जाएगा।

🚩विभाजन संकट में अद्वितीय नेतृत्व!!

🚩16 अगस्त 1946 को मुहम्मद अली जिन्नाह ने सीधी कार्यवाही का दिन घोषित कर के हिन्दू हत्या का तांडव मचा दिया। उन्ही दिनों में श्री गुरूजी देश भर के अपने प्रत्येक भाषण में देश विभाजन के खिलाफ डट कर खड़े होने के लिए जनता का आह्वान करते रहे किन्तु कांग्रेसी नेतागण अखण्ड भारत के लिए लड़ने की मनः स्थिति में नहीं थे। पण्डित नेहरू ने भी स्पष्ट शब्दों में विभाजन को स्वीकार कर लिया था और 3 जून 1947 को इसकी घोषणा कर दी गई। एकाएक देश की स्थिति बदल गई। #इस कठिन समय में स्वयंसेवकों ने पाकिस्तान वाले भाग से हिंदुओं को सुरक्षित भारत भेजना शुरू किया। संघ का आदेश था कि जब तक आखिरी हिन्दू सुरक्षित ना आ जाए तब तक डटे रहना है। भीषण दिनों में #स्वयंसेवकों का अतुलनीय पराक्रम, रणकुशलता, त्याग और बलिदान की गाथा भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से लिखने लायक है। श्री गुरूजी भी इस कठिन घड़ी में पाकिस्तान के भाग में प्रवास करते रहे।

🚩संघ पर प्रतिबन्ध!!

🚩30 जनवरी 1948 को गांधी हत्या के मिथ्या आरोप में 4 फरवरी को संघ पर प्रतिबन्ध लगाया गया। #श्री गुरूजी को गिरफ्तार किया गया। देश भर में स्वयंसेवको की गिरफ्तारियां हुई। जेल में रहते हुए उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं का विस्तृत व्यक्तव्य भेजा जिसमें सरकार को मुहतोड़ जवाब दिया गया था। आह्वान किया गया था कि संघ पर आरोप सिद्ध करो या प्रतिबन्ध हटाओ। देश भर में यह स्वर गूंज उठा था। 26 फरवरी 1948 को देश के प्रधानमन्त्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को गृह मंत्री वल्लभ भाई पटेल ने अपने पत्र में लिखा था "गांधी हत्या के काण्ड में मैंने स्वयं अपना ध्यान लगाकर पूरी जानकारी प्राप्त की है। उस से जुड़े हुये सभी अपराधी लोग पकड़ में आ गए हैं। उनमें एक भी व्यक्ति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नहीं है।"

🚩9 दिसम्बर 1948 को #सत्याग्रह नाम के इस आंदोलन की शुरुआत होते ही कुछ 4-5 हजार बच्चों का यह आंदोलन है ऐसा मानकर नेतागण ने इसका मजाक उड़ाया। लेकिन उसके उलट किसी भी कांग्रेसी आंदोलन में इतनी संख्या नहीं थी। 77090 स्वयंसेवकों ने विभिन्न जेलों को भर दिया। आखिरकार संघ को लिखित #संविधान बनाने का आदेश दे कर प्रतिबन्ध हटा लिया गया और अब गांधी हत्या का इसमें जिक्र तक नहीं हुआ।

🚩तब #सरदार वल्लभभाई पटेल ने गुरूजी को भेजे हुए अपने सन्देश में लिखा कि "संघ पर से पाबन्दी उठाने पर मुझे जितनी खुशी हुई इसका प्रमाण तो उस समय जो लोग मेरे निकट थे वे ही बता सकते हैं... मैं आपको अपनी शुभकामनाएं भेजता हूँ।"

🚩चीन आक्रमण के दौरान श्री गुरूजी का मार्गदर्शन!!

🚩श्री गुरूजी ने चीनी आक्रमण शुरू होते ही जो मार्ग दर्शन दिया उसके परिप्रेक्ष्य में स्वयंसेवक युद्ध प्रयत्नों में जनता का समर्थन जुटाने तथा उनका मनोबल दृढ करने में जुट गए। उनके सामयिक सहयोग का महत्व पण्डित नेहरू को भी स्वीकार करना पड़ा और उन्होंने सन् 1963 में गणतंत्र दिवस के पथ संचलन में कुछ कांग्रेसियों की आपत्ति के बाद भी संघ के स्वयंसेवकों को भाग लेने हेतु आमंत्रण भिजवाया। कहना न होगा कि #संघ के तीन हजार गणवेषधारी स्वयंसेवकों के घोष की ताल पर कदम मिलाकर चलना उस दिन के कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण था।

🚩सन् 1940 से 1973 इन 33 वर्षों में श्रीगुरुजी नें संघ को #अखिल भारतीय स्वरुप प्रदान किया। इस कार्यकाल में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारप्रणाली को सूत्रबध्द किया। श्रीगुरुजी, अपनी विचार शक्ति व कार्यशक्ति से विभिन्न क्षेत्रों एवम् संघटनाओं के कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणास्रोत बनें। #श्रीगुरुजी का जीवन अलौकिक था, राष्ट्रजीवन के विभिन्न पहलुओं पर उन्होंने मूलभूत एवम् क्रियाशील मार्गदर्शन किया ।

🚩कैसे वीर हो गए इस देश में, जब धर्म की बात आयी तो शास्त्र उठाया और जब कर्म की बात आयी तो शस्त्र उठाने में भी पीछे नही हटे....!