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Thursday, September 3, 2015

Mortal Sins By Immortal Men

क्यों अभी भी बापू आसाराम सलाखों के पीछे  हैं ?

देश के अधिकारी तंत्र, न्यायतंत्र  और कानून बनाने वाले  उस देश के किसी नागरिक को सताने की अगर ठान लें, तो राई का पहाड़ बनाकर वह हमेशा सफल होते हैं ।

धर्म गुरु बापू आसारामजी की कहानी भी लगभग समान है । उनको सताना पूर्व निर्धारित था और उसके बाद एक मनगढ़ंत केस बनाया गया । एक मासूम बच्चे के समान बापू इस जाल में फसाए गए ।
          इस केस के बारे में काफी कुछ लिखा गया है ।  घटना का विवरण, आरोपों को सिद्ध करने के लिए पुलिस द्वारा किये गए प्रयास,  बापू के बचाव के लिए राष्ट्रीय स्तर के वकीलों का आना, उनका याचिकाएं दायर करना, भक्तों के उग्र प्रदर्शन यह सब बहुत समय तक अखबारों की सुर्खियां रहीं । लेकिन कुछ भी काम नहीं आया। जब भी बापूजी को न्यायलय लाया गया हर बार न्यायालय और जेल के आसपास विशाल जनसमूह इकट्ठा हुआ, अखबारों ने बापू के चित्र खूब छापे,  कभी उदास और दया की सिफारिश करते हुए,  कभी प्रसन्नचित्त और आत्मविश्वास से भरे कि कुछ गलत नहीं हो सकता उनके साथ । 
बापू के ऊपर एक नाबालिग लड़की के यौन शौषण का आरोप है ।
समय-समय पर विश्व में हर जगह धार्मिक संस्थाओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं ।

सरकार और राजा सारे धार्मिक संस्थानों से भ्रष्टाचार हटाने के लिए अभियान चलाये तो वह आम आदमी द्वारा सराहनीय होगा, लेकिन जब कोई पृथक व्यक्ति को निशाना बनाया जाता है और उनको सताया जाता है तो समाज इसको मंजूरी नहीं देता है ।  सत्तारूढ़ पार्टी और राजनैतिक ताकत बढ़ाने के लिए हमेशा एक विशेष धर्म और समुदाय का समर्थन किया है । राजनीति एक वैश्या के समान है, उसका कोई चरित्र नहीं है।  राजनीतिक विचारधारा गौण हो जाती है जब सत्तारूढ़ पार्टी का नेता अपने ही पार्टी के उग्र शक्तियों को कमजोर करना चाहता हो । कीमत है बली के बकरे की ज़िन्दगी और वो बली का बकरा बापूजी हैं ।
पोक्सो एक्ट 2012 एक विस्तृत एक्ट है जो सारे पहलुओं को समविष्ट करता है। यह एक्ट 18 वर्ष से कम उम्र वालों को बच्चे की तरह परिभाषित करता है और यौन शोषण के विभिन्न प्रकारों का उल्लेख करता है जैसे भेदनशील उत्पीड़न, अभेदनशील उत्पीड़न, लैंगिक उत्पीड़न और अश्लील साहित्य । यह एक्ट उत्पीड़न को कुछ परिस्थितियों में "तीव्र" की श्रेणी में मानता है जैसे की बच्चा अगर मानसिक अस्वस्थ हो या फिर उत्पीड़न किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया हो जो बच्चे के सम्बन्ध में विश्वास के सम्बन्ध में हो जैसे परिवार का सदस्य, डॉक्टर, पुलिस या शिक्षक। " द ओल्ड मैन" में एक्ट के उल्लंघन देखिये ।
जन्म प्रमाण पत्र स्थानीय bodies के द्वारा प्रदान किया जाता है जैसे कि शहरी क्षेत्र में नगर निगम द्वारा और ग्रामीण क्षेत्र में ग्राम पंचायत द्वारा। क्योंकि 5 में से 2 जन्म घर पे ही होते हैं इसलिए मेडिकल सर्टिफिकेट आवश्यक नहीं होता जन्म प्रमाण पत्र पाने के लिए। पीड़ित की उम्र का पता लगाने के लिए कुछ वैज्ञानिक पद्धति का उपयोग करना चाहिए। जन्म प्रमाण पत्र इस देश में आयु का विश्वसनीय सबूत नहीं है।
​रिपोर्ट के अनुसार देवदासी प्रथा भारत की आंध्र प्रदेश और तेलंगाना प्रान्त में अभी भी प्रचलित है। ये और भी राज्यों मे प्रचालित हो सकता है। ये धर्म के नाम पर Priests द्वारा नाबालिक लड़कियों के शोषण की समाज द्वारा स्वीकृत प्रथा है। क्या हम उसे ख़त्म करने में सफल हो पाए हैं? क्या देश का कानून उनपर लागू होता है या उनके लिए कोई अलग नियम कायदे हैं!!​
बापू ने लड़की का बलात्कार नहीं किया,  चिकित्सा परीक्षण ने  ये सिद्ध किया है ।


Translation in Hindi of the Article BY © Vipin Behari Goyal
Advocate, Rajasthan High Court, Jodhpur, India 
http://vipinbeharigoyal.blogspot.in/2015/09/mortal-sins-by-immortal-men.html



Sunday, August 16, 2015

Press Council Slammed Rajasthan Patrika's Editor

🚩🚩जागो।हिंदुस्तानी🚩🚩

💥राजस्थान पत्रिका के संपादक को प्रेस परिषद् की फटकार



🚩(स्रोत: न्यूज़ भारती हिंदी      तारीख: 07 Aug 2015 14:29:24)
नई दिल्ली, अगस्त ७: भारतीय प्रेस परिषद् ने राजस्थान के प्रमुख हिंदी अख़बार राजस्थान पत्रिका के संपादक को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहनराव भागवत के भाषण को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किये जाने और उस पर सम्पादकीय टिप्पणी करने का दोषी करार देते हुए उसकी भर्त्सना की हैं और उसे फटकार लगायी है।
💥जयपुर के डॉ रमेश चन्द्र अग्रवाल द्वारा २९ अप्रैल २०१३ को प्रेस परिषद को इस आशय की शिकायत भेजी गयी थी जिसमें राजस्थान पत्रिका के संपादक पर डॉ भागवत के इंदौर के भाषण को तोड़-मरोड़कर प्रकाशित करने का और उस पर सम्पादकीय टिप्पणी करने का आरोप लगाया था. प्रेस परिषद ने अपने ८ जुलाई २०१५ के आदेश में राजस्थान पत्रिका को दोषी करार देते हुए परनिन्दा (Admonition) का निर्णय दिया है।



💥राजस्थान पत्रिका से अपने पत्र को अपेक्षित प्रतिसाद न मिलने के बाद ही डॉ अग्रवाल ने प्रेस परिषद का दरवाजा खटखटाया था और उस अख़बार के खिलाफ करवाई करने की मांग की थी.
💥राजस्थान पत्रिका ने “बेशर्मशीर्ष” शीर्षक से लिखे एक सम्पादकीय टिप्पणी में संघ के सरसंघचालक डॉ भागवत के इंदौर के वक्तव्य के कुछ अंश सन्दर्भ के बिना उद्धृत किये थे जिसके कारण एक विवाह जैसे पवित्र सम्बन्ध के बारे में एक गलत सन्देश समाज में गया था. राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित वह वक्तव्य इस प्रकार था: “लोग जिसको विवाह कहते हैं वह तो पति और पत्नी के बीच एक करार होता है। किसी कारण से अगर वह करार पूर्ण नहीं होता है तो पत्नी पति को या पति पत्नी को छोड़ सकता है।"
🚩वास्तव में डॉ भागवत का यह वक्तव्य उनके इंदौर में दिए गए भाषण का एक अंश है। यह भाषण २००-३०० साल पुराने सामाजिक करार (Social Contract Theory) के सिद्धांत की समीक्षा पर था. अपने भाषण के दौरान संघ के प्रमुख ने भारतीय और पाश्चात्य तत्वज्ञान और सिद्धांतों के अनेकों उदाहरण दे कर अपने मुद्दे को अधिक स्पष्ट करने का प्रयास किया था. 
💥उनके इस वक्तव्य को सन्दर्भ के बिना प्रकाशित कर राजस्थान पत्रिका ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन को और उसके सम्माननीय प्रमुख डॉ भागवत को अपमानित किया है, ऐसा शिकायतकर्ता ने कहा था.
💥यह उल्लेखनीय है की इस भाषण को जब सारा मिडिया तोड़ मरोड़ कर दिखा रहा था तब भी न्यूज भारती ने उस भाषण को सही तथ्यों के साथ प्रकाशित किया था।
 💥डॉ अग्रवाल ने राजस्थान पत्रिका के संपादक को एक पत्र लिख कर गलती को दुरुस्त करने की प्रार्थना की थी और उनके द्वारा भेजे गए स्पष्टीकरण को प्रकाशित करने की विनती की थी. पर उन्हें उचित प्रतिसाद नहीं मिला जिसके चलते २९ अगस्त २०१३ को डॉ अग्रवाल ने राजस्थान पत्रिका को ‘कारण बताओ’ नोटिस जारी किया था. पर उसको भी कोई प्रतिसाद नहीं मिला.
उलटे, इस अख़बार ने अपने लिखित बयान में शिकायतकर्ता के शिकायत को आधारहीन और असत्य बताया. 💥अख़बार ने कहा की उन्होंने जो प्रकाशित किया हैं वह पूर्णतः ‘सत्यता’ पर ही आधारित है। अपने समर्थन में अख़बार ने यह भी कहा की देश के अन्य कई अख़बारों ने इसी प्रकार डॉ भागवत के वक्तव्य को प्रकाशित किया है।
💥पर डॉ अग्रवाल ने राजस्थान पत्रिका के इस युक्तिवाद को खारिज कर दिया और ३१ मार्च २०१५ को फिर से प्रेस परिषद की समिति के सामने अख़बार के खिलाफ करवाई की मांग को दोहराया.
💥इस प्रकरण में अंतिम बार ६ अप्रैल २०१५ को जब प्रेस परिषद की जाँच समिति की बैठक हुई तो उस में शिकायतकर्ता की ओर से श्री जी एस गिल और श्री हरभजन सिंह तथा अखबर की ओर से श्री अंकित आर कोठारी ने अपने-अपने पक्ष रखे.
शिकायतकर्ता के वकीलों ने दलील दी कि श्री भागवत ने अपने विचारों को अधिक सुस्पष्ट करने हेतु पाश्चात्य तत्वज्ञान में प्रचलित सामाजिक करार के सिद्धांत को उद्धृत किया था जिसे अख़बार ने शब्दशः श्री भागवत का वक्तव्य हैं ऐसा प्रकाशित किया. 
💥सम्पादकीय टिपण्णी यह दर्शाती है कि श्री भागवत सामाजिक करार के सिद्धांत के समर्थक हैं जबकि ऐसा नहीं है।अतः अखबार ने उनके वक्तव्य को गलत ढंग से और बिना संदर्भ के प्रकाशित किया हैं.
संपादकीय टिप्पणी और श्री भागवत के भाषण को सटीक पढने के बाद जाँच समिति ने कहा कि भारतीय तत्वज्ञान तथा पाश्चात्य तत्वज्ञान के भेद स्पष्ट करते हुए डॉ भागवत ने सामाजिक करार के सिद्धांत का उदाहरण दिया था।समिति का यह मानना था कि राजस्थान पत्रिका ने सन्दर्भ को छोड़ कर केवल उतने अंश को ही प्रकाशित किया और ऐसा कर अख़बार ने डॉ भागवत के वक्तव्य को गलत ढंग से और गलत तरीके से प्रतिपादित किया है।
💥अपने इस निष्कर्ष पर आधारित समिति ने राजस्थान पत्रिका के संपादक को परनिन्दा करने का और उक्त निर्णय को अख़बार में प्रकाशित करने का निर्देश दिया और प्रेस परिषद को इस निर्णय की जानकारी दी. समिति के निर्णय को स्वीकार करते हुए प्रेस परिषद ने संघ के सरसंघचालक के भाषण के गलत समाचार देने  और सम्पादकीय टिप्पणी करने के आरोप में राजस्थान पत्रिका के संपादक की भर्त्सना की और फटकार लगायी.
💥हाल ही में संघ के शीर्षस्थ नेताओं के भाषणों को तोड़-मरोड़कर प्रकाशित करने और उस माध्यम से जनता में भ्रम पैदा करने की कोशिशें समाचार पत्रों और टीवी चैनलों द्वारा की जाने के अनेक उदहारण दिखाई देते हैं।डॉ भागवत के इंदौर के इस भाषण के सन्दर्भ में भी यही हुआ हैं. राजस्थान पत्रिका के केस में प्रेस परिषद का यह निर्णय ऐसे सभी समाचार पत्रों एवं टीवी चैनलों के लिए सीख की एक मिसाल है।



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